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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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३६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० कारणनियमः । यदि च कारणान्तरादप्युपपद्यमानस्य शब्दस्य तदनित्यत्व- मुपपद्यते, किमत्र प्रतिषिध्यत इति ! ॥ २८ ॥ अनुपलब्धिसमप्रकरणम् [ २९-३१ ] न प्रागुच्चारणाद् विद्यमानस्य शब्दस्यानुपलब्धिः, कस्मात् ? आवरणाद्य- नुपलब्धेः । यथा विद्यमानस्योदकादेरर्थस्याऽऽवरणादेरनुपलब्धिः, नैवं शब्दस्या- ग्रहणकारणेनाऽऽवरणादिनाऽनुपलब्धिः, गृह्येत चैतदस्याग्रहणकारणमुदका- दिवत्, न गृह्यते, तस्मादुदकादिविपरीतः शब्दोऽनुपलभ्यमान इति । तदनुपलब्धेरनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्विपरीतोपपत्तेरनुपलब्धिसमः ॥ २९ ॥ तेषामावरणादीनामनुपलब्धिर्नोपलभ्यते, अनुपलब्भान्नास्तीत्यभावोऽस्याः सिद्ध्यति । अभावसिद्धौ हेत्वभावात् तद्विपरीतमस्तित्वमावरणादीनामवधार्यते, तद्विपरीतोपपत्तेर्यत्प्रतिज्ञातम्—'न प्रागुच्चारणाद्विद्यमानस्य शब्दस्यानुपलब्धिः' इति, एतन्न सिद्ध्यति । सोऽयं हेतुरावरणाद्यनुपलब्धेरित्यावरणेषु चाऽऽवरणा- द्यनुपलब्धौ च समयानुपलब्ध्या प्रत्यवस्थितोऽनुपलब्धिसमो भवति ॥ २९ ॥ अस्योत्तरम्— अनुपलब्भात्मकत्वादनुपलब्धेरहेतुः ॥ ३० ॥ से कार्य की उत्पत्ति कही गयी है, न कि कार्यकारणविशेषनियम बतलाया गया है । यदि वहाँ किसी अन्य हेतु से उत्पन्न उस शब्द में अनित्यत्व सिद्ध हो जाये तो किसका प्रतिषेध किया जाता है ! ॥ २८ ॥ अब 'अनुपलब्धिसम' का लक्षण कर रहे हैं— उच्चारण से पूर्व भी शब्द विद्यमान ही है तो उसकी अनुपलब्धि नहीं होगी; क्योंकि उसके आवरण की उपलब्धि नहीं होती । जैसे विद्यमान उदक की आवरण से अनुपलब्धि होती है, ऐसे शब्द का अग्रहणकारण आवरणप्रयुक्त उपलब्ध्वभाव नहीं है । यदि होता तो उसका भी उदकादि के आवरण की तरह अग्रहणकारण आवरण गृहीत होता, गृहीत होता नहीं, अतः मानना पड़ेगा कि उदकादि की अनुपलब्धि से विपरीत (असत् होने से) शब्द की अनुपलब्धि है । आवरण की अनुपलब्धि के अनुपलम्भ से उसके अभाव की सिद्धि होने पर तद्विप- रीतोपपादन से 'अनुपलब्धिसम' होता है ॥ २९ ॥ उन आवरणादिकों की अनुपलब्धि उपलब्ध नहीं होती, उपलब्ध न होने से इस अनुपलब्धि का अभाव सिद्ध होता है । अभाव सिद्ध होने पर हेत्वभाव से तद्विपरीत आवरणादि का अस्तित्व निश्चित होता है । यों इस तद्विपरीतोपपादन से आपका पूर्व प्रतिज्ञात 'उच्चारण से पूर्व विद्यमान शब्द की अनुपलब्धि नहीं होगी'—यह मत सिद्ध नहीं होता । यों यह 'अनुपलब्धि' हेतु आवरणादि तथा आवरणाद्यनुपलब्धि—दोनों को सिद्ध करने में निश्चय करने दे रहा है, अतः यहाँ 'अनुपलब्धिसम' प्रतिषेध है ॥ २९ ॥ इसका उत्तर है— अनुपलब्धि के अनुपलम्भात्मक होने से वह अहेतु है ॥ ३० ॥