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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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३६४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० शब्द इति। अथ न सर्वदा भवति, अनित्यत्वस्याभावान्नित्यः शब्दः। एवं नित्यत्वेन प्रत्यवस्थानात्—नित्यसमः ॥ ३५ ॥ अस्योत्तरम्— प्रतिषेध्ये नित्यमनित्यभावादनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेः प्रतिषेधाभावः ॥ ३६ ॥ प्रतिषेध्ये शब्दे नित्यमनित्यत्वस्य भावादित्युच्यमाने, अनुज्ञातं शब्दस्या- नित्यत्वम्। अनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेश्च नानित्यः शब्द इति प्रतिषेधो नोपपद्यते। अथ नाभ्युपगम्यते नित्यमनित्यत्वस्य भावादिति हेतुर्न भवतीति हेत्वभावात् प्रतिषेधानुपपत्तिरिति। उत्पन्नस्य निरोधादभावः—शब्दस्यानित्यत्वम्, तत्र परिप्रश्नानुपपत्तिः। सोऽयं प्रश्नः—'तदनित्यत्वं किं शब्दे सर्वदा भवति, अथ न?' इत्यनुपपन्नः, कस्मात्? उत्पन्नस्य यो निरोधादभावः शब्दस्य तदनित्यत्वम्, एवं च सत्यधिकरणाधेय- विभागो व्याघातान्नास्तीति। नित्यानित्यत्वविरोधाच्च। नित्यत्वमनित्यत्वं च एकस्य धर्मिणो धर्माविति विरुध्येते, न सम्भवतः। तत्र यदुक्तम्—नित्यमनित्यत्वस्य भावाद् नित्य एव, तदवर्तमानार्थमुक्तमिति ॥ ३६ ॥ तद्वान् धर्मी भी नित्य रहेगा तो अनित्य शब्द नित्य हो गया ! यदि सदा नहीं रहता तो अनित्यत्व के अभाव से पुनः शब्द नित्य हो गया । यों नित्यत्व से प्रतिषेध 'नित्यसम' कहलाता है ॥ ३५ ॥ इसका उत्तर— 'प्रतिषेध्य में अनित्यभाव सर्वदा रहने से अनित्य में भी अनित्यत्वोपपत्ति बन जाने से प्रतिषेध नहीं होगा ॥ ३६ ॥ 'प्रतिषेध्य शब्द में अनित्यत्व के नित्य रहने से' ऐसा कहने पर शब्द का अनित्यत्व स्वीकार कर लिया गया, इस प्रकार अनित्य शब्द में अनित्यत्वोपपत्ति से 'शब्द अनित्य नहीं है' यह प्रतिषेध नहीं बनता। यदि ऐसा नहीं मानते तो अनित्यत्व के नित्य होने से वह हेतु नहीं बनेगा, यों हेत्वभाव से प्रतिषेध नहीं बनेगा । शब्द के अनित्यत्व से तात्पर्य है उत्पन्न के निरोध से अभाव । इस स्थिति में प्रश्न ही नहीं बनता कि क्या 'शब्द में ,अनित्यत्व सर्वदा रहता है या नहीं ?' क्योंकि उत्पन्न के निरोध से अभाव रूप शब्द में अनित्यत्व रहेगा कैसे ? वह है नहीं । इस प्रकार परस्पर विरोध से आधाराधेयविभाग नहीं है । नित्यानित्यविरोध से भी । एक धर्मी में नित्यत्व अनित्यत्व—ये दो धर्म विरुद्ध होने से असम्भव हैं । अतः वह कहना कि 'अनित्यत्व के नित्य रहने से वह नित्य ही है'— अर्थशून्य है ॥ ३६ ॥