न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context३८. सू० ] कार्यसमप्रकरणम् ३६५ कार्यसमप्रकरणम् [ ३७-३८ ] प्रयत्नकार्यनिकत्वात् कार्यसमः ॥ ३७ ॥ प्रयत्नानन्तरीयकत्पादनित्यः शब्द इति-यस्य प्रयत्नानन्तरमात्मलाभः तत् खल्वभूत्वा भवति, यथा घटादिकार्य्यम्, अनित्यमिति च भूत्वा न भवती- त्येतद् विज्ञायते । एवमवस्थिते प्रयत्नकार्यनिकत्वादिति प्रतिषेध उच्यते । प्रयत्नानन्तरमात्मलाभश्च दृष्टो घटादीनाम्, व्यवधानापोहाच्चाभिव्यक्तिर्व्य- वहितानाम्, तत्किं प्रयत्नानन्तरमात्मलाभः शब्दस्य, आहोऽभिव्यक्तिरिति ?- विशेषो नास्ति । कार्य्याविशेषेण प्रत्यवस्थानम्—कार्यसमः ॥ ३७ ॥ अस्योत्तरम्— कार्य्यान्यत्वे प्रयत्नाहेतुत्वमनुपलब्धिकारणोपपत्तेः १ ॥ ३८ ॥ सति कार्य्यान्यत्वे अनुपलब्धिकारणोपपत्तेः प्रयत्नास्याहेतुत्वं शब्दस्याभि- व्यक्तौ । यत्र प्रयत्नान्तरमभिव्यक्तिस्तत्रानुपलब्धिकारणं व्यवधानमुपपद्यते, व्यवधानापोहाच्च । प्रयत्नानन्तरभाविनोऽर्थस्योपलब्धिलक्षणाऽभिव्यक्तिर्भवती- ति । न तु शब्दस्यानुपलब्धिकारणं किञ्चिदुपपद्यते, यस्य प्रयत्नानन्तर- 'कार्यसम' का लक्षण करते हैं— प्रयत्न से उत्पादित कार्यों के अनेक होने से भी शब्द अनित्य है ॥ ३७ ॥ 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से शब्द अनित्य हैं'—यह स्थापनावाक्य है । जिसकी प्रयत्न के बाद सत्ता होती है, वह पहले न होता हुआ होता है, जैसे-घटादि । 'अनित्य' उसे कहते हैं जो होकर न हो । ऐसा मानने पर, प्रयत्न के अनेक कार्य होने से सूत्रोक्त प्रतिषेध कहा जाता है । जैसे एक प्रयत्नानन्तर आत्मलाभ तो घटादि का देखा जाता है । दूसरा प्रयत्नानन्तर व्यवधान के अपोह से व्यवहितों की 'अभिव्यक्ति' देखी जाती है । इनमें से प्रयत्नानन्तर शब्द का आत्मलाभ है या अभिव्यक्ति—इसमें कोई निश्चायक हेतु नहीं दिया । यों कार्यसामान्य से प्रतिषेध 'कार्यसम' कहलाता है ॥ ३७ ॥ इसका उत्तर है— कार्यद्वैविध्य होने पर भी प्रयत्न का अहेतुत्व ही है; अनुपलब्धिकारणोपपादन होने से ॥ ३८ ॥ कार्यद्वैविध्य होने पर भी, अनुपलब्धिकारणोपपादन पहले हो चुका है, अतः शब्द की अभिव्यक्ति में प्रयत्न का अहेतुत्व ही हैं । जहाँ अभिव्यक्ति प्रयत्नानन्तर है, वहाँ अनुपलब्धिकारण व्यवधानरूप होने से उपपन्न होता है । वहाँ व्यवधानापोह से प्रयत्नान्तर- भावी अर्थ की उपलब्धिलक्षण अभिव्यक्ति होती है, शब्द का अनुपलब्धिकारण ऐसा कोई व्यवधान उपपन्न नहीं होता है, जिससे प्रयत्नानन्तर व्यवधान के अपोह से १. 'अनुपलब्धिकारणानुपपत्तेः'—इति पाठ० ।