न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context३६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० मपोहाच्छब्दस्योपलब्धिलक्षणाऽभिव्यक्तिर्भवतीति। तस्मात् 'उत्पद्यते शब्दो नाभिव्यज्यते' इति ॥ ३८ ॥ षट्पक्षीप्रकरणम् [ ३९-४० ] हेतोश्चेदनेकान्तिकत्वमुपपाद्यते, अनैकान्तिकत्वादसाधकः स्याद् इति। यदि चानैकान्तिकत्वादसाधकत्वम्; प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः ॥ ३९ ॥ प्रतिषेधोऽप्यनैकान्तिकः। किञ्चित् प्रतिषेधति, किञ्चिन्नेति—अनैकान्ति- कत्वादसाधक इति। अथ वा—शब्दस्यानित्यत्वपक्षे प्रयत्नानन्तरमुत्पादो नाभिव्यक्तिरिति विशेषहेत्वभावः। नित्यत्वपक्षेऽपि प्रयत्नानन्तरमभिव्यक्ति- र्नोत्पाद इति विशेषहेत्वभावः। सोऽयमुभयपक्षसमो विशेषहेत्वभाव इत्युभय- मप्यनैकान्तिकमिति ॥ ३९ ॥ सर्वत्रैवम् ॥ ४० ॥ शब्द की उपलब्धिलक्षण अभिव्यक्ति होती हो। अतः यही मानना चाहिये कि 'शब्द उत्पन्न होता है न कि अभिव्यक्त' ॥ ३८ ॥ [ इस प्रकार चौबीस जातियों का क्रमशः लक्षण तथा प्रत्याख्यानोपाय बताते हुए, शब्दानित्यत्व भी साथ-साथ सिद्ध कर दिया गया। अब षट्पक्षीरूप कथाभास का प्रसंग उठा रहे हैं— ] 'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण, घट की तरह'—यह स्थापनावादी का प्रथम पक्ष है। यहाँ हेतु में व्यभिचार दोष दिखाकर 'व्यभिचार होने से प्रयत्नानन्तरीयकत्व हेतु शब्दानित्यत्व सिद्ध नहीं कर सकता' यह द्वितीय पक्ष प्रति- वादी का है। यदि व्यभिचार होने से हेतु साध्य का असाधक है तो प्रतिषेध में भी समानदोष है ॥ ३९ ॥ प्रतिषेध भी व्यभिचरित है; क्योंकि वह किसी में नित्यत्व का प्रतिषेध करता है, किसी में नहीं। यों अनैकान्तिक होने से प्रतिषेध भी असाधक है। यह तीसरा पक्ष है। अथवा—शब्द के अनित्यत्वपक्ष में प्रयत्न के पश्चात् उत्पाद है, अभिव्यक्ति नहीं'— इसमें कोई विशेष हेतु नहीं दिया गया। उधर नित्यत्वपक्ष में 'प्रयत्न के पश्चात् अभि- व्यक्ति है, उत्पाद नहीं'—इसमें भी कोई विशेष हेतु नहीं दिया गया। इस प्रकार, दोनों ही पक्षों में विशेषहेत्वभाव समान है, अतः यहाँ अनैकान्तिक दोष है ॥ ३९ ॥ [ प्रसङ्गोपात्त एक बात बीच में ही कह रहे हैं— ] सर्वत्र ऐसा ही है ॥ ४० ॥