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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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३७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः प्रतिज्ञाविरोधः ॥ ४ ॥ गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यमिति प्रतिज्ञा, रूपांदितोऽर्थान्तरस्यानुपलब्धेरिति हेतुः, सोऽयं प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः । कथम् ! यदि गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्, रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिर्नोपपद्यते । अथ रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिः, 'गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्' इति नोपपद्यते, गुणव्यतिरिक्तं च द्रव्यं रूपादिभ्यश्चा- र्थान्तरस्यानुपलब्धिरिति विरुध्यते = व्याहन्यते, न सम्भवतीति ॥ ४ ॥ पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्थापनयनं प्रतिज्ञासंन्यासः ॥ ५ ॥ 'अनित्यः शब्द ऐन्द्रियकत्वात्' इत्युक्ते परो ब्रूयात्—'सामान्यमैन्द्रियकं न चानित्यमेवं शब्दोऽप्यैन्द्रियको न चानित्यः' इति । एवं प्रतिषिद्धे पक्षे यदि ब्रूयात्—'कः पुनराह अनित्यः शब्दः' इति ! सोऽयं प्रतिज्ञातार्थनिह्नवः प्रतिज्ञा- संन्यास इति ॥ ५ ॥ अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरम् ॥ ६ ॥ निदर्शनम्—'एकप्रकृतीदं व्यक्तम्' इति प्रतिज्ञा, कस्माद्धेतोः ? एकप्रकृतीनां विकाराणां परिमाणात् । मृत्पूर्वकाणां शरावादीनां दृष्टं परिमाणम् । यावान् प्रकृतेर्व्यूहो भवति तावान् विकार इति, दृष्टं च प्रतिविकारं परिमाणम् । प्रतिज्ञा तथा हेतु का परस्पर विरोध 'प्रतिज्ञाविरोध' कहलाता है ॥ ४ ॥ 'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह प्रतिज्ञा हुई । 'रूपादि से अर्थान्तर की उपलब्धि न होने से'—यह हेतु है । यहाँ प्रतिज्ञा-हेतु का विरोध है । कैसे ? यदि द्रव्य गुण- व्यतिरिक्त है तो रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि उपपन्न नहीं होती । तथा यदि रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि है तो 'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह उपपन्न नहीं होता । द्रव्य गुणव्यतिरिक्त हो तथा रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि भी हो ये दोनों विषय परस्पर विरुद्ध हैं, यों विरुद्ध होने से ये दोनों बातें (प्रतिज्ञा और हेतु) एक साथ सम्भव नहीं ॥ ४ ॥ स्वपक्षप्रतिषेध होने पर प्रतिज्ञातार्थ को छिपाना 'प्रतिज्ञा-संन्यास' कहलाता है ॥ ५ ॥ 'शब्द अनित्य है, ऐन्द्रियक होने से' ऐसा कहने पर प्रतिवादी कहे—'सामान्य ऐन्द्रियक है, पर अनित्य नहीं है; इसी तरह शब्द भी ऐन्द्रियक है; वह भी अनित्य नहीं' । यों प्रतिषिद्ध होने पर वादी यदि यह कहें—'हमने कब कहा कि शब्द अनित्य है !' यह प्रतिज्ञातार्थनिह्नव (उसको छिपाना या उससे हट जाना) 'प्रतिज्ञासंन्यास' कहलाता हैं ॥५॥ सामान्य रूप से उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर उसमें कुछ 'विशेष' लगाकर सिद्धि चाहने वाले का 'हेत्वन्तर' निग्रहस्थान होता है ॥ ६ ॥ उदाहरण—वादी ( साङ्ख्यमतानुयायी ) की प्रतिज्ञा है—'व्यक्त एकप्रकृति है', किस हेतु से ? 'एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण होने से' । मृत्तिका से बने शरावादि में परिमाण देखा जाता है, जितने प्रकार की प्रकृति का संस्थान होता है उन सभी का विकार देखा जाता है। प्रत्येक विकार में परिमाण भी देखा जाता है । यह परिमाण