न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context७. सू० ] निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७३ अस्ति चेदं परिमाणं प्रतिव्यक्तम्, तदेकप्रकृतीनां विकाराणां परिमाणात्पश्यामः- व्यक्तमिदमेकप्रकृतीति । अस्य व्यभिचारेण प्रत्यवस्थानम्-नानाप्रकृतीनामेकप्रकृतीनां च विकाराणां दृष्टं परिमाणमिति । एवं प्रत्यवस्थिते आह-एकप्रकृतिसमन्वये सति शरावादि- विकाराणां परिमाणदर्शनात्, सुखदुःखमोहसमन्वितं हीदं व्यक्तं परिमितं गृह्यते, तत्र प्रकृत्यन्तररूपसमन्वयाभावे सत्येकप्रकृतित्वमिति । तदिदमविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषं ब्रुवतो हेत्वन्तरं भवति । सति च हेत्वन्तरभावे पूर्वस्य हेतोरसाधकत्वान्निग्रहस्थानम्, हेत्वन्तरवचने सति यदि हेत्वर्थनिदर्शनो दृष्टान्त उपादीयते ? नेदं व्यक्तमेकप्रकृति भवति; प्रकृत्यन्तरो- पादानात् । अथ नोपादीयते ? दृष्टान्ते हेत्वर्थस्यानिदर्शितस्य साधकाभावानु- पपत्तेरानर्थक्याद्धेतोरनिवृत्तं निग्रहस्थानमिति ॥ ६ ॥ निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ ७-१० ] प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम् ॥ ७ ॥ यथोक्तलक्षणे पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहे हेतुतः साध्यसिद्धौ प्रकृतायां ब्रूयात् नित्यः शब्दो ऽस्पर्शत्वादिति हेतोः । हेतुर्नाम हिनोतेर्धातोस्तुन् प्रत्यये कृदन्तपदम्, प्रत्येक में व्यक्त है । यों एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण से सांख्यानुयायी मानते हैं— 'यह व्यक्त एकप्रकृति है' । प्रतिवादी इसका व्यभिचार से निषेध करता है—'नानाप्रकृतिक तथा एकप्रकृतिक ऐसे दोनों तरह के विकारों का परिमाण लोक में देखा जाता है' । यों, प्रतिषेध किये जाने पर वादी फिर कहता है—'एकप्रकृतिसमन्वय होने की अवस्था में शरावादि विकारों में परिमाण देखा जाने से, सुख-दुःख-मोह-समन्वित यह व्यक्त विशिष्टतया ही गृहीत होता है, तात्पर्य यह है कि इस हेतु में प्रकृत्यन्तररूप समन्वय के अभाव होने पर एक- प्रकृतित्व है' । यों यह, सामान्यरूपेण उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर, हेतुविशेष का निवेश करने पर वादी का हेत्वन्तर हो जाता है । हेत्वन्तरत्व हो जाने पर हेतु के असाधक हो जाने से वह निग्रहस्थान हो गया । हेत्वन्तरवचन होने पर भी, यदि हेत्वर्थनिदर्शन ( साध्य- साधनभाव का व्याप्यव्यापकभाव से निदर्शन ) के लिये दृष्टान्त का उपादान किया जाता है तो प्रकृत्यन्तरोपादान की संभावना से यह व्यक्त का एकप्रकृतित्व नहीं सिद्ध होता । तथा यदि उपादान नहीं किया जाता तो अनिदर्शित हेत्वर्थ में साधकत्व का उपपादन न होने से दृष्टान्त का हेतु निग्रहस्थान रह ही गया ॥ ६ ॥ प्रकृत अर्थ से असम्बद्ध अर्थ कहना 'अर्थान्तर' निग्रहस्थान है ॥ ७ ॥ यथोक्तलक्षण पक्षप्रतिपक्षपरिग्रह में हेतु से साध्य-सिद्धि करना चाहने पर कोई कहे— 'शब्द नित्य है' । इस में 'अस्पर्शत्व होने से' हेतु दे । यहाँ 'हेतु' शब्द 'हि गतो वृद्धौ च'