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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० सर्वार्थोपलब्धौ नेन्द्रियाणि प्रभवन्तीति सर्वविषयमन्तःकरणं मनः। शरीरेन्द्रिया- र्थबुद्धिसुखवेदनानां निर्वृत्तिकारणं प्रवृत्तिः, दोषाश्च ; 'नाऽस्येदं शरीरमपूर्व- मनुत्तरं च, पूर्वशरीराणामादिर्नास्ति उत्तरेषामपवर्गोऽन्तः' इति प्रेत्यभावः । ससाधनसुखदुःखोपभोगः फलम् । दुःखमिति नेदमनुकूलवेदनीयस्य सुखस्य प्रतीतेः प्रत्याख्यानम्, किं तर्हि ? जन्मन एवेदं ससुखसाधनस्य दुःखानुषङ्गात्, दुःखेनाविरोधाद्, विविधबाधनायोगाद् 'दुःखम्' इति समाधिभावनमुपदिश्यते । समाहितो भावयति, भावयन्निर्विविद्यते, निर्विण्णस्य वैराग्यम्, विरक्तस्यापवर्ग इति । जन्ममरणप्रबन्धोच्छेदः सर्वदुःखप्रहाणमपवर्ग इति । अस्त्यन्यदपि द्रव्य- गुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाः प्रमेयम्, तद्भेदेन चापरिसङ्ख्येयम् । अस्य तु तत्त्वज्ञानादपवर्गः, मिथ्याज्ञानात् संसार इत्यत एतदुपदिष्टं विशेषेणेति ॥ ९॥ (क) आत्मलक्षणम् तत्राऽऽत्मा तावत्प्रत्यक्षतो न गृह्यते। स किमाप्तोपदेशमात्रादेव प्रतिपद्यत करने में इन्द्रियाँ समर्थ नहीं हो सकतीं, अतः मन को पृथक् प्रमेय मानना पड़ा । वह सभी (बाह्य-आभ्यन्तर-भेदभिन्न) विषयों का ज्ञान-साधन है। शरीर, इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ, बुद्धि, सुख तथा हर्ष भय, शोकादि वेदनाओं के सम्पादनकारण को प्रवृत्ति कहते हैं। उपर्युक्तप्रवृत्तिकारण को दोष कहते हैं। 'इसका यह अपूर्व शरीर नहीं हैं, न अनुत्तर शरीर है, पूर्व शरीरों का आदि नहीं है, उत्तर शरीरों का अन्त मोक्ष है'—ऐसा प्रमेय प्रेत्यभाव कहलाता है। साधन (स्रक्चन्दनवनितातथा धूलिताड़न,, निद्रादि) सहित सुख- दुःखों का उपभोग फल कहलाता है। दुःख यह प्रमेय अनुकूलवेदनीय लक्षणवाले सुख का प्रत्याख्यानमात्र नहीं है; किन्तु साधनसहित सुखवाले मुमुक्षु को जन्म से ही दुःखानुषक्त होने से, दुःख से छुटकारा न पाये जाने से, तथा आध्यात्मिकादि विविध बाधनाओं के लगे रहने से 'यह दुःख है' ऐसी समाधि भावना का उपदेश किया गया है। मुमुक्षु समाहितचित्त होकर भावना करता है कि 'सर्वं खल्विदं दुःखम्', भावना करते हुए उसको इस दुःखरूपी संसार से ग्लानि होती है, ग्लानि होते होते वैराग्य हो जाता है, वैराग्य द्वारा वह अपवर्ग ( मोक्ष = जन्ममरणरूपी दुःख से छुटकारा ) पा जाता है। जन्ममरण- प्रवाह का उच्छेद तथा सभी दुःखों का आत्यन्तिक नाश ही 'अपवर्ग' कहलाता है। यों तो (अन्य शास्त्रों में ) प्रमेयों के अन्य भेद भी हैं, जैसे—'द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय'—आदि। उनके अवान्तर भेद से प्रमेय के इतने विभाग हो जाते हैं कि उनकी गणना ही कठिन है। यहाँ सूत्रकार को इतना ही अभीष्ट है कि तत्त्व- ज्ञान से अपवर्ग होता है, और मिथ्याज्ञान से संसार । अतः उन्होंने तदनुकूलतया इस विशेष प्रमेयसमूह का उपदेश कर दिया है ॥ ९ ॥ आत्मा का प्रत्यक्ष से ग्रहण नहीं होता, तो क्या वह केवल आप्तोपदेश (शब्दप्रमाण) CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri