न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१०. सू० प्रमेयप्रकरणम् २७ इति ? नेत्युच्यते; अनुमानाच्च प्रतिपत्तव्य इति । कथम् ? इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम् ॥ १० ॥ यज्जातीयस्यार्थस्य सन्निकर्षात् सुखमात्मोपलब्धवान्, तज्जातीयमेवार्थं पश्यन्नुपादातुमिच्छति, सेयमादातुमिच्छा एकस्यानेकार्थदर्शिनो दर्शनप्रति- सन्धानाद्भवन्ती लिङ्गमात्मनः । नियतविषये हि बुद्धिभेदमात्रे न सम्भवति, देहान्तरवदिति । एवमेकस्यानेकार्थदर्शिनो दर्शनप्रतिसन्धानात् दुःखहेतौ द्वेषः । यज्जातीयो- ऽस्यार्थः सुखहेतुः प्रसिद्धस्तज्जातीयमर्थं पश्यन्नादातुम्प्रयतते, सोऽयं प्रयत्न से ही जाना जायेगा ? कहते हैं—नहीं; आप्तोपदेश के बाद अनुमान से भी उस को समझना चाहिये । कैसे ?— इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख दुःख, ज्ञान—ये आत्मा के ज्ञापक लिङ्ग हैं ॥ १० ॥ प्रमाता जिस जातीय अर्थ-सन्निकर्ष से सुख प्राप्त करता है, वैसे ही जातीय अर्थ को पुनः देखकर उसे ग्रहण करने की इच्छा करता है, यह ग्रहण करने की इच्छा ही यतः अनेकार्थद्रष्टा के दर्शनान्तर से एकाश्रयता का सन्धान कराती है अतः किसी एक प्रमेय में दर्शन-प्रतिसन्धान कराती हुई 'आत्मा है'—इसमें हेतु है। [ बात को यों समझें— किसी वस्तु को पुनः पुनः सुखोत्पादक अनुभव करके 'यह वस्तु सुखोत्पादक है, जहाँ यह वस्तु है, वहाँ सुख है'—ऐसा व्याप्तिनिर्धारण करता है। कुछ समय बाद फिर उसी वस्तु को देखकर 'यह पूर्वानुभूत सुखवाली ही वस्तु हैं' ऐसा स्मरण करता है, तब 'यह सुख देगी'—ऐसा निगमन करके उसे ग्रहण करना चाहता है। इस इच्छा से पहले के व्याप्तिज्ञान, स्मृतिज्ञान तथा निगमन का कोई एक प्रतिसन्धाता होना चाहिये जो इच्छा कर सके, अतः इस इच्छा से अनुमान होता है कि ऐसी इच्छा करने वाला कोई आत्मा है। तात्पर्य यह है कि यह जो एक अनुभवितृ, स्मर्त्तृ, अनुमाता तथा एषिता है वही नैयायिकों के मत में 'आत्मा' कहलाता है।] शङ्का—किसी एक ज्ञाता (आत्मा) के न मानने पर भी बुद्ध्यादि के सन्तान (प्रवाह) से भी प्रतिसन्धान-व्यवस्था तो बन ही जायेगी फिर एक अतिरिक्त आत्मा मानने से क्या लाभ ? बुद्धि के प्रतिनियतविषय होने के कारण प्रतिसन्धान-व्यवस्था सम्भव नहीं है, जैसे वर्तमान बुद्ध्यादिकों का देहान्तर में प्रतिसन्धान नहीं हो पाता । इसी तरह एक के ही अनेक अर्थों का साक्षात्कर्ता होने के कारण दर्शनप्रतिसन्धि सम्भव होने से दुःखोत्पादक विषय में द्वेष होता है। इस प्रमाता का जिस तरह का विषय सुखहेतु प्रसिद्ध है, उसी तरह के विषय को ग्रहण करने का प्रयत्न करता है, यह प्रयत्न साक्षात्कर्ता तथा दर्शनप्रतिसन्धिक्कर्ता के एक हुए बिना नहीं हो सकता। बुद्ध्यादिकों की प्रवाह-व्यवस्था उनके नियत होने से