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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० फलनिर्वृत्तिर्न प्रत्याख्यायते । तदेवं सति वचनविघातोऽसम्भूतार्थकल्पनया नोपपद्यत इति ॥ १३ ॥ उपचारच्छललक्षणम् धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम् ॥ १४ ॥ अभिधानस्य धर्मो यथार्थप्रयोगः । धर्मविकल्पः = अन्यत्र दृष्टस्यान्यत्र प्रयोगः । तस्य निर्देशे धर्मविकल्पनिर्देशे¹ । यथा—मञ्चाः क्रोशन्तीति अर्थ- सद्भावेन प्रतिषेधः—'मञ्चस्थाः पुरुषा क्रोशन्ति, न तु मञ्चाः क्रोशन्ति' । का पुनरत्रार्थविकल्पोपपत्तिः ? अन्यथा प्रयुक्तस्यान्यार्थकल्पनम्, भक्त्या प्रयोगे प्राधान्येन कल्पनमुपचारविषयं छलमुपचारच्छलम् । उपचारो नीतार्थः सहचरणादिनिमित्तेन, अतद्भावे तद्वदभिधानम् = उपचार इति । अत्र समाधिः—प्रसिद्धे प्रयोगे वक्तुर्यथाभिप्रायं शब्दार्थयोरभ्यनुज्ञा प्रतिषेधो वा, न च्छन्दतः । प्रधानभूतस्य शब्दस्य भाक्तस्य च गुणभूतस्य प्रयोग उभयोर्लोक- सिद्धः । सिद्धे प्रयोगे यथा वक्तुरभिप्रायः, तथा शब्दार्थावनुज्ञेयौ प्रतिषेध्यौ वा, न प्रशंसा करता हुआ उक्त वाक्य हेतु से फलसंपन्नता का प्रत्याख्यान नहीं करता । इस रीति से असंभूतार्थकल्पना द्वारा वचनविघात वाद में उचित नहीं है ॥ १३ ॥ स्वभावविकल्पनिर्देशक वाक्य में अर्थ की सत्ता का निषेध करना 'उपचारच्छल' कहलाता है ॥ १४ ॥ यथार्थप्रयोग ही शब्द का स्वभाव है, स्वभाव ( धर्म ) विकल्प से तात्पर्य है—अन्यत्र दृष्ट का अन्यत्र प्रयोग । उस स्वभावविकल्प के निर्देशक पदप्रयोग ( वाक्य ) में ( अर्थ की सत्ता का निषेध 'उपचारछल' कहलाता है ) । जैसे—'मञ्चाः क्रोशन्ति' इस वाक्य में अभिप्रेतार्थ की सत्ता का निषेध करके 'मञ्चस्थ पुरुष चिल्ला रहे हैं,' 'न कि मञ्च चिल्ला रहे हैं'—ऐसा कहना । यहाँ अर्थविकल्पोपपादन क्या है ? अन्य अर्थ में प्रयुक्त की अन्य अर्थकल्पना । गौणार्थ से प्रयुक्त वाक्य में मुख्य अर्थ की कल्पना ही उपचारविषयक छल है, अतः यह 'उपचारच्छल' है । 'उपचार' से तात्पर्य है सहचारादि निमित्त द्वारा अर्थ को अन्यत्र ले जाया जाये । संक्षेप में, 'अतत्त्व में तत्त्वकथन' उपचार कहलाता है । इस ( उपचारछल ) का प्रतीकार यह है—शक्य या भाक्त अर्थ में प्रसिद्ध प्रयोग का शब्दार्थ की अभ्यनुज्ञा या उनका निषेध वक्ता के अभिप्रायाधीन होता हैं, न कि स्वेच्छया । प्रधानभूत ( मुख्य ) शब्द का गौण या भाक्त उभयविध अर्थ में प्रयोग लोक में देखा जाता है । सिद्ध प्रयोग में जैसा वक्ता का अभिप्राय हो वैसे ही शब्द, अर्थ की स्वीकृति या अस्वीकृति देना चाहिये, स्वेच्छा नहीं । जब वक्ता का प्रधानभूत अर्थ में १. वार्त्तिककृत्तु 'धर्मविकल्पेन निर्देशे वाक्ये' इत्येवं व्याचष्टे । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri