न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [१. अ० २. आ० छलस्य द्वित्वमभ्यनुज्ञाय त्रित्वं प्रतिषिध्यते; किञ्चित्साधर्म्यात् । यथा चायं हेतुस्त्रित्वं प्रतिषेधति, तथा द्वित्वमप्यभ्यनुज्ञातं प्रतिषेधति; विद्यते हि किञ्चित्साधर्म्यं द्वयोरपीति । अथ द्वित्वं किञ्चित्साधर्म्यान्न निवर्तते, त्रित्वमपि न निवर्त्स्यति ॥ १७ ॥ लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् [ १८-२० ] जातिलक्षणम् अत ऊर्ध्वम्— साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः ॥ १८ ॥ प्रयुक्ते हि हेतौ यः प्रसङ्गो जायते स जातिः । स च प्रसङ्गः साधर्म्य- वैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानम् = उपालम्भः, प्रतिषेध इति । 'उदाहरणसाधर्म्यात्साध्य- साधनं हेतुः' इत्यस्योदाहरणवैधर्म्येण प्रत्यवस्थानम् । उदाहरणवैधर्म्यात्साध्य- साधनं हेतुः' इत्यस्योदाहरणसाधर्म्येण प्रत्यवस्थानम् । प्रत्यनीकभावाज्जाय- मानोऽर्थो जातिरिति ॥ १८ ॥ निग्रहस्थानलक्षणम् विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम् ॥ १९ ॥ कुछ सादृश्य होने के कारण छल का द्वित्व स्वीकार करके यदि उसके त्रित्व (तीन प्रकार) का निषेध करते हैं तो जैसे यह सादृश्यहेतु उसके त्रित्व का प्रतिषेध करेगा, उसी तरह उसके द्वित्व का भी निषेध कर सकता है; क्योंकि बाकी दो (वाक्छल तथा सामान्य छल) में भी तो किञ्चित् सादृश्य है ही । किञ्चित् सादृश्य से यदि द्वित्व निवृत्त नहीं हो पाता तो उस हेतु से त्रित्व भी कैसे निवृत्त होगा ! अतः छल को तीन प्रकार का ही मानना चाहिये ॥ १७ ॥ इसके बाद— सादृश्य या वैसादृश्य द्वारा हेतुप्रतिषेध 'जाति' कहलाता है ॥ १८ ॥ (छल में साधर्म्य-वैधर्म्य नहीं होते, साधर्म्य या वैधर्म्यमात्र से सम्यक् प्रतिषेध किया भी नहीं जा सकता, बल्कि प्रयोग से किया जा सकता है । इसलिये) हेतु का साधर्म्य वैधर्म्य से जो प्रसङ्ग होता है वह 'जाति' कहलाता है । वह प्रसङ्ग साधर्म्य या वैधर्म्य से प्रत्यवस्थान = उपालम्भ अर्थात् प्रतिषेध कहलाता है । उदाहरण-साधर्म्य से साध्य- साधक हेतु का उदाहरण-वैधर्म्य से प्रतिषेध करना अथवा उदाहरण-वैधर्म्य से साध्य- साधक हेतु का उदाहरण-साधर्म्य से प्रतिषेध करना संक्षेप में विरोधी रूप से उत्पन्न अर्थ 'जाति' है ॥ १८ ॥ विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्ति 'निग्रहस्थान' कहलाता है ॥ १९ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri