पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
Page 127 of 726
Read in context[Header: द्वैतविवेकप्रकरणम् १०९]
'तमेवैकं जानथ आत्मान मन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैष सेतुः' [मुण्ड. २-२-५] इस श्रुति में कहा गया है कि उसी एक तत्व को जान लो। उससे भिन्न समस्त वाणियों का परित्याग कर डालो। 'यच्छेद्वाङ् मनसी प्राज्ञः' (कठ १-३-१३) ज्ञानी पुरुष वाणियों को रोककर मन में बन्द कर दे [फिर निरर्थक हो चुके हुए वाग्व्यापार में फँसा न रह जाय]। इत्यादि श्रुतियों में इसी बात का प्रतिपादन स्पष्ट रीति से किया गया है। अशास्त्रीयमपि द्वैतं तीव्रं मन्दमिति द्विधा। कामक्रोधादिकं तीव्रं मनोराज्यं तथेतरत् ॥४९॥ उभयं तत्वबोधात् प्राङ् निवार्यं बोधसिद्धये। शमः समाहितत्वं च साधनेषु श्रुतं यतः ॥५०॥ अशास्त्रीय द्वैत भी 'तीव्र' और 'मन्द' दो प्रकार का होता है। कामक्रोधादि 'तीव्र द्वैत' कहाता है। मनोराज्य को 'मन्दद्वैत' कहते हैं ॥४९॥ ज्ञान की सिद्धि के लिये यह आवश्यक है कि—इन दोनों ही प्रकार के द्वैत का निवारण कर दिया जाय। क्योंकि ब्रह्म- ज्ञान के साधन जो नित्यानित्यवस्तुविवेक आदि हैं, उनमें शान्ति और समाधि दोनों ही सुने जाते हैं। [इसका अभिप्राय यही है कि जब तक शान्ति और समाधान नहीं होगा, तब तक तत्वज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकेगा। इस कारण तत्वज्ञान से प्रथम प्रथम ही तीव्र और मन्द दोनों प्रकार के द्वैत का परित्याग कर देना चाहिये।] बोधादूर्ध्वं च तद्ध्येयं जीवन्मुक्तिप्रसिद्धये। कामादिक्लेशबन्धेन युक्तस्य नहि मुक्तता ॥५१॥ जब बोध हो चुके तब भी, इन दोनों प्रकार के द्वैतों का, परि-