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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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११० पञ्चदशी त्याग ही रखना चाहिये। नहीं तो जीवन्मुक्ति का मजा हाथ ही नहीं आयगा। क्योंकि कामादि रूपी जो महाक्लेशकारक बन्धन है, जो पुरुष उससे युक्त हो रहा है वह पुरुष मुक्त कैसे हो सकेगा ? [बोध का इतना प्रताप तो होना ही चाहिये कि गीतोक्त दैवी संपत्ति का ज्ञानी में विकास हो जाय। ज्ञान के बाद यदि दैवी- संपत्ति नहीं आयी है तो वह ज्ञान ज्ञान नहीं है ज्ञानाभास है। “नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैन- माप्नुयात्”। जो दुश्चरितों से हटा नहीं है, जो शान्त नहीं है, जो समाधि नहीं करता है, जिसका मन शान्त नहीं हुआ है, वह पुरुष सूखे तत्वज्ञान से इस तत्व को पा नहीं सकता है। कोरे तत्वज्ञान से तो तत्व ज्ञानी स्वयं ही आत्मवंचन करता रहता है और परमार्थ पद को पाने से वंचित रह जाता है।] जीवन्मुक्तिरियं मा भूज्जन्माभावे त्वहं कृती। तर्हि जन्मापि तेऽस्त्वेव स्वर्गमात्रात् कृती भवान्॥५२। “यह जीवन्मुक्ति न मिले तो पड़ी मत मिलो, मैं तो केवल आगामी जन्म न मिलने से ही धन्य हो जाऊँगा” यह विचार दोष- युक्त है, क्योंकि स्वर्ग अर्थात् वैषयिक सुख से धन्यता मान लेने वाले तुम जन्म के बन्धन से छुट नहीं सकोगे। जन्म भी तुम्हारा होगा ही। “जो मैं जन्म-मरण लक्षण संसार से घबरा उठा हूँ, उस मुझे तो विदेह मुक्ति ही चाहिये। मुझे बार बार जन्म लेना न पड़े उसी से मैं कृतकृत्य हो जाऊंगा। इस, बीच की जीवन्मुक्ति से मुझे क्या लेना है? यह मुझे न मिले तो न सही।” ऐसा जिसको भ्रम हो गया हो उससे कहो कि—ऐहिक तुच्छ भोगों के छूटने के डर