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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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५१४ पञ्चदशी काम्य और द्वेष्य पदार्थों में जो (अनित्यता तथा साति- शयता आदि) दोष भरे पड़े हैं, उन दोषों पर दृष्टि रखना आदि बातें, कामादि के त्याग करने के साधन हैं। ये साधन मोक्ष- शास्त्रों में जहां-तहां कहे गये हैं। उन सब साधनों को वहां से ढूँढ लो [वैसे बनो] और सुखी हो जाओ। त्यज्यतामेष कामादि मनोराज्ये तु का क्षतिः । अशेषदोषबीजत्वात् क्षतिर्भगवतेरिता ॥५९॥ “अनर्थ के कारण इन कामादियों को तो हम त्याज्य मान लेते हैं। परन्तु मनोराज्य तो वैसा नहीं है। सो हम मनोराज्य करते रहें, उस में भला क्या हानि है ?” यह विचार भी ठीक नहीं है क्योंकि—यद्यपि मनोराज्य से साक्षात् तो कोई अनर्थ नहीं होता है, परन्तु परम्परा से तो सम्पूर्ण दोषों का मूलकारण यह मनोराज्य ही है। इस से मनोराज्य से बड़ी हानि होती है यह बात भगवान् कृष्ण ने कही हैं। ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते । सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥६०॥ जो पुरुष विषयों का ध्यान करता [किंवा मनोराज्य करता] रहता है, वह फिर उन विषयों को अच्छा समझने लगता है [अर्थात् उसे उन विषयों में संग हो जाता है]। संग से कामना की उत्पत्ति होती है [वह फिर उन विषयों को अपने लिये मांगने या चाहने लगता है] उस कामना से क्रोध उत्पन्न हो जाता है। [उस कामना के पूरा होने में जो रुकावट डालता है उस पर क्रोध आता है ] यों मनोराज्य ही तो सम्पूर्ण अनर्थों की जड़ है।