पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextद्वैतविवेकप्रकरणम् ११५ शक्यं जेतुं मनोराज्यं निर्विकल्पसमाधितः । सुसंपादः क्रमात् सोऽपि सविकल्पसमाधिना ॥६१॥ केवल निर्विकल्प समाधि से ही मनोराज्य जीता जा सकता है। वह निर्विकल्प समाधि धीरे धीरे सविकल्प समाधि करते करते प्राप्त हो सकती है। बुद्धतत्त्वेन धीदोषशून्येनैकान्तवासिना । दीर्घं प्रणवमुच्चार्य मनोराज्यं विजीयते ॥६२॥ जिस को आत्मतत्व का ज्ञान हो चुका हो—जिस को आत्मद्रव्य की सूचना सद्गुरु से मिल चुकी हो—बुद्धि के काम क्रोधादि दोषों से जो रहित हो चुका हो, जो विजन देश (हृदय) में रहने लगा हो, ऐसा पुरुष [चार छ आठ दस किंवा बारह मात्रा] लम्बे प्रणव का उच्चारण कर करके मनोराज्य को जीत सकता है । जिते तस्मिन् वृत्तिशून्यं मनस्तिष्ठति मूकवत् । एतत्पदं वसिष्ठेन रामाय बहुधेरितम् ॥६३॥ उस मनोराज्य के जीत लेने पर मन के सकल व्यापार इस प्रकार बन्द हो जाते हैं जैसे कि गूंगा आदमी सम्पूर्ण वाग्व्यव- हार से रहित होकर चुपचाप बैठा होता है। ऐसे शान्त पद का वर्णन वशिष्ठ ने राम के प्रति अनेक प्रकार से किया है । [इस कारण इस दशा को परम पुरुषार्थ मानना चाहिये ] । दृश्यं नास्तीति बोधेन मनसो दृश्यमार्जनम् । संपन्नं चेत्तदुत्पन्ना परा निर्वाणनिर्वृतिः ॥६४॥ 'नेह नानास्ति किंचन'(बृ०४-४-१९) इस श्रुति के अनुसार जब यह ज्ञान हो जाय कि 'दृश्य नहीं है' और इस ज्ञान के