पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextद्वैतविवेकप्रकरणम् ११७ नहीं माना जाता । वेदान्त के पारदर्शी मुनि लोग तो कहते हैं कि वह तो साक्षात् ब्रह्म ही है । [उस महापुरुष को पूर्वाभ्यास- वश गौणरूप से ही 'ब्रह्मवित्' कहा जा सकता है] । दर्शनादर्शने हित्वा स्वयं केवलरूपतः । यस्तिष्ठति स तु ब्रह्मन् ब्रह्म न ब्रह्मवित्स्वयम् ॥६८॥ वशिष्ठ ने भी कहा है कि—ब्रह्म को जानता हूँ या ब्रह्म को नहीं जानता हूँ इन दोनों ही झगड़ों को छोड़ कर जो महा पुरुष स्वयं केवल अद्वितीय चैतन्य रूप से अवस्थित हो बैठता है, अथवा केवल बन जाता है हे ब्रह्मन् ! वह तो साक्षात् ब्रह्म ही है [ऐसे महापुरुष को ब्रह्मज्ञानी कह कर छोटा सा बना देना ठीक नहीं है]। जीवन्मुक्तेः पराकाष्ठा जीवद्वैतविवर्जनात् । लभ्यतेऽसावतोऽत्रेद मीशद्वैताद्विवेचितम् ॥६९॥ उक्त प्रकार की जीवन्मुक्ति की अन्तिम अवस्था किसी को जभी मिल सकती है जब वह जीव के द्वैत [किंवा मनोमय प्रपंच] का परित्याग कर चुका हो । इसी कारण से हमने ईश्वर के बनाये हुए द्वैत से जीव के द्वैत को पृथक् करके मुमुक्षु लोगों को दिखा दिया है । इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं द्वैतविवेकप्रकरणं समाप्तम्