पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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महावाक्यविवेकप्रकरणम् ॥५॥
येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च । स्वाद्वस्वादू विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥१॥ जिस से देखता है, सुनता है, सूंघता है, बोलता है, स्वादु अस्वादु को जानता है, उसी को 'प्रज्ञान' कहा जाता है । 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐत० ५-१) 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृ० १-४-१०) 'तत्त्वमसि' (छा० ६-८-७) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृ० २-५-१९) ये चार महावाक्य हैं। जिन से मुमुक्षु को मोक्ष के साधन ब्रह्मात्मै- कता का ज्ञान हो जाता है । इन्हीं चारों वाक्यों के अर्थों का निरूपण इस प्रकरण में किया है । सब से प्रथम ऋक्शाखा के ऐतरेयारण्यक के 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस महावाक्य का अर्थ करते हुए प्रज्ञान शब्द का अर्थ बताया जाता है कि—चक्षु और श्रोत्र के द्वारा बाहर निकली हुई अन्तःकरण की वृत्ति से उपहित जिस चैतन्य से यह संसार रूपादि पदार्थों को देखा करता और शब्दों को सुना करता है, नासिका के द्वारा बाहर निकली हुई अन्तःकरण वृत्ति को उपाधि बनाये हुए जिस चैतन्य से भले बुरे गन्ध सूंघे जाते हैं, वागिन्द्रिय से ढके हुए जिस चैतन्य से शब्द बोले जाते हैं, रसना से निकले हुए अन्तःकरण की वृत्ति को अपनी उपाधि बनाये हुए जिस चैतन्य से स्वादु और