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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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[ ये अपना रूप बदल देते हैं। कभी प्रिय द्वेष्य हो जाते हैं और द्वेष्य प्रिय बन जाते हैं इत्यादि ।] स्याद् व्याघ्रः संमुखो द्वेष्यो ह्युपेक्ष्यस्तु पराङ्मुखः । लालनादनुकूलश्चेद् विनोदायेति शेषताम् ॥५३॥ देख लो कि—जो व्याघ्र सामने से [ खाने को ] आता है वह 'द्वेष्य' होता है । जब वह लौट कर दूसरी तरफ निकला चला जाता है तब वही 'उपेक्ष्य' हो जाता है । वही व्याघ्र यदि लालन से अपने अनुकूल हो जाय तो अपने विनोद की वस्तु हो जाती है, यों अपना उपकारक होकर अपना 'प्रिय' किंवा 'शेष' हो जाता है । व्यक्तीनां नियमो मा भूल्लक्षणात्तु व्यवस्थितिः । आनुकूल्यं प्रातिकूल्यं द्वयाभावश्च लक्षणम् ॥५४॥ यद्यपि 'प्रिय' 'अप्रिय' या 'उपेक्ष्य' आदि नाम की कोई भी एक नियत वस्तु नहीं होती, फिर भी व्यवहार की व्यवस्था तो लक्षण के कारण हो ही जाती है। अनुकूलता 'प्रिय' का लक्षण है। प्रतिकूलता 'द्वेष्य' का लक्षण बताया जाता है। जो तो अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न हो उसको 'उपेक्ष्य' मानते हैं । आत्मा प्रेयान्, प्रियः शेषो, द्वेषोपेक्षे तदन्ययोः । इति व्यवस्थितो लोको याज्ञवल्क्यमतं च तत्॥५५॥ [इस सब का संक्षेप यही है कि]—आत्मा अत्यन्त प्रिय है। शेष अर्थात् अपने साधन बने हुए पदार्थ प्रिय कहाते हैं। आत्मा और आत्मा के शेष से भिन्न जितने भी पदार्थ होते