पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 510, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४८८ पंचदशी है, उन में से किसी से तो द्वेष होता है और किसी की उपेक्षा की जाती है। यों चार विभागों के कारण लोक की व्यवस्था हो रही है [इन चार विभागों के अतिरिक्त और किसी प्रकार के पदार्थ नहीं पाये जाते] आत्मा आदि की जो प्रियतमता आदि हमने बतायी है वह याज्ञवल्क्य को भी सम्मत है [देखो बृहदारण्यक मैत्रेयी ब्राह्मण] अन्यत्रापि श्रुतिः प्राह पुत्राद् वित्तात् तथान्यतः । सर्वस्मादान्तरं तत्त्वं तदेतत् प्रेय इष्यताम् ॥५६॥ केवल मैत्रेयी ब्राह्मण में ही नहीं, किन्तु पुरुषविध ब्राह्मण में भी आत्मा को प्रियतम कहा है। वहाँ कहा गया है कि— पुत्र से, धनधान्य से और सभी कुछ से, यह आत्मतत्त्व अत्यन्त अन्दर का पदार्थ है। इस कारण इस को प्रेय [अर्थात् प्रियतम] मान लेना चाहिये । श्रौत्या विचारदृष्ट्यायं साक्ष्येवात्मा न चेतरः । कोशान् पंच विविच्यान्तर्वस्तुदृष्टि र्विचारणा ॥५७॥ प्रकृत में तो हमें इतना ही कहना है कि—श्रौती विचारदृष्टि करें तो यह अकेला साक्षी तत्व ही 'आत्मा' कहा सकता है। इस से भिन्न पुत्रादि कुछ भी आत्मा नहीं है। यदि [तैत्तिरीय श्रुति में बताये प्रकार से] अन्नमय आदि पांच कोशों को आत्मा से पृथक् कर लिया जाय और उन सब के अन्दर छिपी हुई जो आत्मवस्तु है उससे विचार की आंखें भिड़ा दी जांय, तो बस यही 'विचारणा' कहाती है। जागरस्वप्नसुप्तीना मागमापायभासनम् । यतो भवत्यसावात्मा स्वप्रकाशचिदात्मकः ॥५८॥