भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 726 में से

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ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८९


अन्दर की आत्मवस्तु को देखने की विधि किंवा आत्मविचार की पद्धति तो यह है कि— [ आने जाने वाली जो] 'जागरण' 'स्वप्न' तथा 'सुषुप्ति' अवस्था हैं, इनमें से अगली के आने और पिछली के चले जाने की प्रतीति जिस नित्य चैतन्य रूप साक्षी से हुआ करती है वही स्वप्रकाशचिद्रूप पदार्थ 'आत्मा' है । शेषाः प्राणादिवित्तान्ता आसन्नास्तारतम्यतः । प्रीतिस्तथा तारतम्यात् तेषु सर्वेषु वीक्ष्यते ॥५९॥ शेष[अर्थात् उस साक्षी से भिन्न] प्राण से लेकर वित्तपर्यन्त जितने भी पदार्थ हैं [जिन को आगे बताया गया है] न्यूनाधिक भाव से आत्मा के समीपवर्ती होते हैं । जिस अनुपात से वे आत्मा के समीपवर्ती हैं उसी अनुपात से उन सब (प्राणादियों) में प्रीति पायी जाती है । वित्तात् पुत्रः प्रियः,पुत्रात् पिण्डः,पिण्डात्तथेन्द्रियम् । इन्द्रियाच्च प्रियः प्राणः, प्राणादात्मा प्रियः परः ॥६०॥ [प्रीति की न्यूनाधिकता इस प्रकार होती है कि] धन से तो पुत्र प्यारा होता है। पुत्र की अपेक्षा शरीर पर अधिक प्यार किया जाता है। शरीर से इन्द्रियें अधिक प्यारी होती हैं। इन्द्रियों से प्राण प्यारे हैं। आत्मा तो प्राणों से भी बहुत अधिक प्रिय माना गया है । सभी प्राणी पुत्र की विपत्ति को हटाने के लिये धन को व्यय कर डालते हैं । पुत्र पर विपत्ति आने पर धन की पर्वाह नहीं की जाती । कभी कभी तो अपने देह की रक्षा के लिये पुत्रों तक को छोड़ दिया जाता है। इन्द्रियों के नाश को बचाने के लिये लाठी डण्डों की मार से देह को पिटवाना पड़ता है और

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