भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 512, कुल 726 में से

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४९० पञ्चदशी इन्द्रियों को बचा लेते हैं। मरने का प्रसङ्ग आपड़े तो इन्द्रियों का छेदन भी सहन किया जाता है और प्राणों को बचा लिया जाता है। आत्मा का कल्याण दीख पड़ता हो तो प्राणों का परित्याग करते हुए 'गर्व' और 'हर्ष' दोनों ही पाये जाते हैं। यों जो जो पदार्थ आत्मा के जितना जितना अधिक निकट है, वह उतना ही उतना अधिक प्रिय होता है। इस बातका अनुमोदन सभी का अनुभव कर रहा है। परन्तु आत्मा की सर्वाधिक प्रियता की ओर को पामर पुरुषों का ध्यान जाता ही नहीं। वहां तक तो विद्वानों का अनुभव ही पहुँच सकता है। एवं स्थिते विवादोऽत्र प्रतिबुद्धविमूढयोः । श्रुत्योदाहारि तत्रात्मा प्रेयानित्येव निर्णयः ॥६१॥ यों आत्मा की प्रियतमता प्रमाण से सिद्ध भी है तो भी ज्ञानी और अज्ञानी की विप्रतिपत्ति को हटाने के लिये श्रुति ने उन दोनों के विवाद का वर्णन कर दिया है और यही निर्णय किया है कि आत्मा ही प्रियतम है। साक्ष्येव दृश्यादन्यस्मात् प्रेयानित्याह तत्ववित् । प्रेयान् पुत्रादिरेवेमं भोक्तुं साक्षीति मूढधीः ॥६२॥ 'अन्य सब दृश्य पदार्थों से अधिक प्रिय तो यह साक्षी ही है' ऐसा तत्वज्ञानी समझता है। मूढबुद्धि का तो यह विचार होता है कि—प्रियतम तो पुत्रादि ही हैं यह साक्षी आत्मा तो इन [प्रियतम पुत्रादि] को भोगने के लिये इस संसार में उतरा है। आत्मनोऽन्यं प्रियं ब्रूते शिष्यश्च प्रतिवाद्यपि । तस्योत्तरं वचो बोधशापौ कुर्यात् तयोः क्रमात् ॥६३॥ आत्मा से भिन्न को प्रिय कहने वाले दो होते हैं—एक