भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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'शिष्य' दूसरा 'प्रतिवादी' । शिष्य के लिये उत्तर यही है कि उसे आत्मबोध कराया जाय [और उसके अनुभव से ही आत्मा की प्रियता को कहलाया जाय] प्रतिवादी के लिये उत्तर यही है कि उसे शाप दिया जाय—उसे भय अर्थात् इस मन्तव्य से होने वाली हानि दिखायी जाय [जैसा कि ६९ श्लोक में दिखाया गया है ।] प्रियं त्वां रोत्स्यतीत्येवमुत्तरं वक्ति तत्ववित् । स्वोक्तप्रियस्य दुष्टत्वं शिष्यो वेत्ति विवेकतः ॥६४॥ [ तत्वज्ञानी पुरुष शिष्य और प्रतिवादी दोनों को एक ही उत्तर देता है कि ]—हे शिष्य ! या हे प्रतिवादिन् तेरा माना हुआ [ पुत्रादिरूपी ] प्रिय जब नष्ट होने लगेगा तब वह तुम्हें [दोनों को] रुलायेगा । [रोक लेगा,बांध कर बैठा लेगा] शिष्य जब इस उत्तर को सुनता है तब अपने प्रेमपात्र पुत्रादि के दोषों का निम्नरीति से विचार करके उनकी दोषदुष्टता को पहचान जाता है । अलभ्यमानस्तनयः पितरौ क्लेशयेच्चिरम् । लब्धोऽपि गर्भपातेन प्रसवेन च बाधते ॥६५॥ जातस्य ग्रहरोजादिः कुमारस्य च मूर्खता । उपनीतेऽप्यविद्यत्व मनुद्वाहश्च पण्डिते ॥६६॥ यूनश्च परदारादि दारिद्र्यं च कुटुम्बिनः । पित्रोर्दुःखस्य नास्त्यन्तो धनी चेन्म्रियते तदा ॥६७॥ दोषों का विचार करने की रीति यह है कि—जब पुत्र की आशा नहीं होती तब माता पिता को उस अजात पुत्र से चिर- काल तक बड़ा क्लेश रहता है । पुत्र की आशा भी हो और गर्भपात हो जाय तब और भी क्लेश होता है । प्रसव काल में