पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 514, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४९२ पञ्चदशी माता को अकथनीय दुःख देता है । उत्पन्न होने पर ग्रहपीडा या रोगों का आक्रमण हो जाय तो माता पिता को बड़े कष्टों का सामना करना पड़ता है । कुमारावस्था में यदि वह विद्या न पढ़ने लगे तो भी माँ-बाप दुःखी ही रहते हैं । उपनयन हो जाने पर यदि विद्या प्राप्त न कर सके तो भी दुःख का कारण बन जाता है । पण्डित होकर यदि उसका विवाह न हो सके तो मां बाप के कष्ट का अन्त ही मत पूछो । युवा होकर यदि परस्त्री- गमनादि दुराचार करने लगे तो मां बाप मुँह दिखाने योग्य भी नहीं रहते । सन्तान वाला होकर भी यदि वह दरिद्र रहे तो भी वे उससे चिन्तित ही रहते हैं । धनी होकर भी यदि वह भरी जवानी में मर जाय तब तो माता पिता की आंखों के सामने अंधेरा हो जाता है । यों माता पिता की कष्टकथा का अन्त ही नहीं होता । एवं विविच्य पुत्रादौ प्रीतिं त्यक्त्वा, निजात्मनि । निश्चित्य परमां प्रीतिं, वीक्षते तमहर्निशम् ॥६८॥ इस प्रकार पुत्र, स्त्री आदि जितने भी प्रिय प्रतीत होने वाले पदार्थ हैं, उनके दोषों को जानकर, उनसे प्रेम छोड़कर, अपने आत्मा में ही परम प्रेम का निश्चय करके, दिन रात उस आत्मा का ही अनुसन्धान करने लग जाता है । आग्रहाद् ब्रह्मविद्वेषादपि पक्षममुञ्चतः । वादिनो नरकः प्रोक्तो दोषश्च बहुयोनिषु ॥६६॥ आग्रह से [कि पुत्रादि की प्रियता को तो मैं कभी छोड़ ही नहीं सकता हूँ] तथा ब्रह्मविद्वेष से [कि इसके कहे हुए ब्रह्म की तो मैं धज्जी उड़ा डालूँगा] अपने पक्ष को न छोड़ने वाले.