पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२५ रूप इति (बृ. १-४-७) इस श्रुति में कहा गया है कि—सृष्टि से पहले यह सब जगत् अव्याकृत था [ अर्थात् इस का नाम और इसका रूप अप्रकट दशा में था ] सृष्टि बन चुकने पर वह जगत् दो प्रकार से [ अर्थात् वाच्य वाचक भाव से ] व्यक्त हो गया है। तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् (बृ. १-४-७) इस वाक्य के अव्याकृत शब्द से ब्रह्म में रहने वाली यह अचिन्त्यशक्ति माया ही ली गयी है। [ इस श्रुति का अव्याकृत शब्द इस माया को ही कह रहा है ]। अविक्रियब्रह्मनिष्ठा विकारं यात्यनेकधा । मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ॥६६॥ [ 'तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियते' इस श्रुतिखण्ड का भाव इस श्लोक में दिखाया गया है ] अव्याकृत नाम की वही माया, अविक्रिय ब्रह्म में रहती रहती ही, अनेक रूप से परिणाम को प्राप्त होती आती है [ यह भूत भौतिक सभी प्रपंच उसी अव्या- कृत नाम वाली माया का विकार किंवा परिणाम है ] मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् इस श्रुति में कहा है कि पूर्वोक्त 'माया' को प्रकृति अर्थात् उपादान कारण जानना चाहिये। माया का आश्रय होने के कारण जो 'मायी' कहाता है उसको महेश्वर अर्थात् माया का नियामक मान लो। [ माया और मायी सर्वथा भिन्न भिन्न प्रकार के हैं ] आद्यो विकार आकाशः सोऽस्ति भात्यपि च प्रियः। अवकाशस्तस्य रूपं तन्मिथ्या न तु तत् त्रयम् ॥६७॥ मायोपहित ब्रह्म का सब से पहला विकार [कार्य] आकाश ही है। वह 'अस्ति' 'भाति' और 'प्रिय' रूप