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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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६६ पञ्चदशी दूसरों के धर्मों की अनुवृत्ति के कारण कहा जाता है कि 'यह जल है' 'यह शून्यतत्व है' यह शब्द, स्पर्श तथा रूप वाला है। इसका अपना गुण तो केवल 'रस' ही है । सतो विवेचितास्वप्सु तन्मिथ्यात्वे च वासिते । भूमिं दशांशतो न्यूना कल्पिताप्स्विति चिन्तयेत् ॥९३ विवेक और ध्यान से जल के मिथ्यात्व का निश्चय करके फिर यह निश्चय करे कि भूमि भी जल से दस भाग कम है और वह भी जल में कल्पित किंवा मिथ्या ही है । अस्ति भूस्तत्त्वशून्यास्यां शब्दस्पर्शी सरूपकौ । रसश्च परतो गन्धो नैजः, सत्ता विविच्यताम् ॥९४॥ भूमि है, वह निस्तत्व है, इस में शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस ये गुण दूसरों से आये हैं [क्योंकि कारणों के धर्म कार्य में आया करते हैं] । गन्ध इसका निज गुण है । उन सब में से सत्ता का विवेक अथवा पृथक्करण कर डालना चाहिये । पृथक्कृतायां सत्तायां भूमिर्मिथ्याऽवशिष्यते । भूमे दशांशतो न्यूनं ब्रह्माण्डं भूमिमध्यगम् ॥९५॥ सत्ता के पृथक् कर लेने पर भूमि नाम का पदार्थ मिथ्या हो जाता है [अब आगे भौतिक ब्रह्माण्डादियों से सत् का विवेक कैसे करें ? वह दिखाया जाता है कि] भूमिमध्यग अर्थात् आकाश में घूमते रहने वाले भूमि के खण्डों [परमा- णुओं] से बना हुआ यह ब्रह्माण्ड भूमि से दस भाग कम है । ब्रह्माण्डमध्ये तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश । भुवनेषु वसन्त्येषु प्राणिदेहा यथायथम् ॥९६॥