भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६५ वायु है तो एक भाग अग्नि है] वह वह्नि भी वास्तव पदार्थ नहीं है, वह भी वायु में कल्पित है। पुराणों के कथनानुसार इन पांचों भूतों में १/१० भाग के अनुसार क्रम से न्यूनाधिक भाव है। वह्निरुष्णः प्रकाशात्मा पूर्वानुगतिरत्र च । अस्ति वह्निः स निस्तत्वः शब्दवान् स्पर्शवानपि॥८९॥ वह्नि उष्ण है और प्रकाशस्वरूप है। इस में भी वायु की तरह पूर्वानुगति अर्थात् कारण के धर्मों की अनुगति हो ही रही है। जभी तो कहा जाता है कि वह्नि है। वह निस्तत्व [मिथ्या] है शब्द और स्पर्श भी उस में रहते हैं। सन्मायाव्योमवाय्वंशैर्युक्तस्याग्नेर्निजो गुणः । रूपं, तत्र सतः सर्वमन्यद् बुद्ध्या विविच्यताम्॥९०॥ सत् माया आकाश तथा वायु के अंशों से युक्त जो अग्नि है, उस का अपना गुण तो 'रूप' ही है। उन में से सद्वस्तु को छोड़ कर और जितने भी धर्म हैं वे सब मिथ्या हैं। इस बात का विवेचन [पृथक्करण] बुद्धि के अवष्टम्भ से कर लेना चाहिये। सतो विविक्ते वह्नौ मिथ्यात्वे सति वासिते । आपो दशांशतो न्यूनाः कल्पिता इति चिन्तयेत् ॥९१॥ सत् से वह्नि के विविक्त कर लेने पर और वह्नि के मिथ्यात्व के वासित हो जाने पर फिर यह चिन्तन करना चाहिये कि जल भी वह्नि से दशांश कम है और वह भी कल्पित किंवा मिथ्या ही है । सन्त्यपोऽमूः शून्यतत्त्वाः सशब्दस्पर्शसंयुताः । रूपवत्योऽन्यधर्मानुवृत्त्या स्वीयो रसो गुणः ॥९२॥