पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ पञ्चदशी क्ततारूपी अवान्तर भेद है, उसका प्रकृत में कुछ भी उपयोग नहीं है इसलिये उसका विचार भी कर के क्या करें ? [हम यह इस जगह क्यों बतायें कि यह माया अव्यक्त क्यों है ? तथा उसके कार्य व्यक्त क्यों कर हो गये हैं ?] सद्वस्तु ब्रह्म, शिष्टोंऽशो वायुर्मिथ्या यथा वियत् । वासयित्वा चिरं वायोर्मिथ्यात्वं मरुतं त्यजेत् ॥८६॥ • वायु में जो सदंश [सद्भाग] है वह तो ब्रह्मरूप है । शेष रहा हुआ जो [निस्तत्व आदि] अंश है वही वायु का अपना स्वरूप है । निस्तत्वरूप होने के कारण, यह वायु भी आकाश के समान ही मिथ्या है । इस प्रकार वायु के मिथ्याभाव की वासना चिरकाल तक कर करके, वायु को छोड़ दे [अर्थात् वायु के सत्य होने की बुद्धि का परित्याग कर डाले] उस में से अपनी आस्था को हटा ले । चिन्तयेद् वह्निमप्येवं मरुतो न्यूनवर्तिनम् । ब्रह्माण्डावरणेष्वेषा न्यूनाधिकविचारणा ॥८७॥ वायु से न्यून देश में रहने वाली वह्नि को भी इसी प्रकार से चिन्तन करे और अन्त में उस की भी सत्य बुद्धि का इसी प्रकार परित्याग कर दे । यह न्यूनाधिक का विचार ब्रह्माण्ड के सभी आवरणों में किया जाता है । [लोक में ऐसा विचार नहीं होता । पृथिवी,जल,अग्नि,वायु आदि ब्रह्माण्ड के आवरण कहाते हैं ।] वायोर्दशांशतो न्यूनो वह्निर्वायौ प्रकल्पितः । पुराणोक्तं तारतम्यं दशांशैर्भूतपञ्चके ॥८८॥ अग्नि वायु के दसवें भाग के बराबर है