पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६३ अब केवल धर्म की अनुवृत्ति की जा रही है । फिर हमारे वचन में पूर्वोत्तरविरोध कैसे हो ? ननु सद्वस्तुपार्थक्यादसत्वं चेत्तदा कथम् । अव्यक्तमायावैषम्यादमायामयतापि नो ॥८३॥ हे सिद्धान्ती, यह बताओ कि वायु को सद्ब्रह्म से विल- क्षण होने के कारण यदि तुम असत् [किंवा मायामय] मानते हो तो यह वायु तो अव्यक्तरूप माया से भी विलक्षण ही है [क्योंकि यह तो व्यक्त है] फिर इसे अमायाममय [सत्य] भी क्यों नहीं मान लेते हो ? निस्तत्वरूपतैवात्र मायातत्वस्य प्रयोजिका । सा शक्तिकार्ययोस्तुल्या व्यक्ताव्यक्तत्वभेदिनोः ॥८४॥ सिद्धान्ती का उत्तर यह है कि—अव्यक्तता तो मायामय होने का कारण ही नहीं है । किन्तु निस्तत्वता के कारण इस वायु को मायामय किंवा असत् कहा गया है । वह निस्तत्व- रूपता अव्यक्त माया में भी है और माया के कार्य व्यक्त वायु आदि में भी पाई जाती है [माया और माया के कार्यों में, केवल अव्यक्तता और व्यक्तता का ही भेद है । इस कारण इस की मायामयता किसी युक्त्याभास से टलने वाली वस्तु नहीं है ।] सदसत्वविवेकस्य प्रस्तुतत्वात् स चिन्त्यताम् । असतोऽवान्तरो भेद आस्तां तच्चिन्तयात्र किम् ॥८५॥ इस समय सत् और असत् का विवेक ही प्रस्तुत हो रहा है । उसी का विचार हमें करना चाहिये । माया और माया के कार्यरूपी असत् पदार्थों के, जो कि व्यक्तता और अव्य-