भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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६२ पंचदशी शोषस्पर्शौ गतिर्वेगो वायुधर्मा इमे मताः । त्रयः स्वभावाः सन्मायाव्योम्नां ये तेऽपि वायुगाः॥७९॥ शोष तथा स्पर्श, गति तथा वेग ये चार धर्म वायु के अपने धर्म कहाते हैं। [सत्ता, निस्तत्वरूपता तथा शब्द नाम के] जो तीन अन्य स्वभाव वायु में पाये जाते हैं, वे सत्-माया-तथा आकाश के हैं; वे भी वायु में आ गये हैं। वायुरस्तीति सद्भावः सतो वायौ पृथक्कृते । निस्तत्वरूपता मायास्वभावो, व्योमगो ध्वनिः ॥८०॥ 'वायुरस्ति' वायु है इस व्यवहार की कारण जो सद्रूपता है वह सद्वस्तु का धर्म वायु में आ गया है। सद्वस्तु से वायु के पृथक् कर लेने पर जो निस्तत्वरूपता [मिथ्यात्व] शेष रह जाती है वह वायु में दूसरा माया का धर्म है तथा आकाश से आया हुआ शब्द यह तीसरा वायु का धर्म है । सतोऽनुवृत्तिः सर्वत्र व्योम्नो नेति पुरेरितम् । व्योमानुवृत्तिरधुना कथं न व्याहतं वचः ॥८१॥ इसी प्रकरण के ६७ वें श्लोक में कहा है कि सत् की ही सर्वत्र अनुवृत्ति है आकाश की नहीं। अव् उसके विपरीत वायु आदि में आकाश की अनुवृत्ति कर रहे हो, फिर तुम्हारे कथन में व्याघात [किंवा पूर्वोत्तरविरोध] क्योंकर नहीं है ? छिद्रानुवृत्तिर्नेतीति पूर्वोक्तिरधुनात्वियम् । शब्दानुवृत्तिरेवोक्ता वचसो व्याहतिः कुतः ॥८२॥ इसका उत्तर यह है कि पहले [६७ श्लोक में] यह कहा गया था कि छिद्र अर्थात् आकाश की अनुवृत्ति नहीं होती। अब तो केवल शब्द की अनुवृत्ति की बात कही जा रही है । अर्थात्