पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in context( १६० ) पञ्चतन्त्रम् । दूत बोला,-"भो गरुड ! कभीभी भगवान्के प्रति तुमने ऐसे वचन नहीं कहेथे सो कहतो भगवान्ने तुम्हारा क्या अपमान किया है ?" गरुड बोला,- “भगवान्के आश्रयभूत सागरने इस टिट्टिभके अण्डे ग्रहण करलिये सो यदि- सागरको दण्ड न दियागया तो मैं भगवान्का भृत्य नहीं यह मेरा निश्चय तू कह देना सो तुम शीघ्र जाकर भगवान्से कहो”। तब दूतसे प्यारसे क्रोधित हुए गरुडको जानकर भगवान् विचारने लगे। "अहो ! गरुडका क्रोध सत्यही है सो, स्वयं जाकर सन्मानपूर्वक उसको लाऊं। कहा है- भक्तं शक्तं कुलीनञ्च न भृत्यमपमानयेत् । पुत्रवल्लालयेन्नित्यं य इच्छेच्छ्रियमात्मनः ॥ ३८२ ॥ भक्त समर्थ और कुलीन सेवकका तिरस्कार न करे जो अपना मंगल चाहे तो पुत्रवत् उसको लालन पालन करे ॥ ३८२ ॥ अन्यच्च- और भी- राजा तुष्टोऽपि भृत्यानामर्थमात्रं प्रयच्छति । तेतु सम्मानितास्तस्य प्राणैरप्युपकुर्वते ॥ ३८३ ॥” राजा भृत्योंपर सन्तुष्ट हो धनमात्र देता है और भृत्य सम्मानित हुए प्राण तक लगा देते हैं ॥ ३८३ ॥” इत्येवं सम्प्रधार्य्य रुक्मपुरे वैनतेयसकाशं सत्वरमगमत, वैनतेयोऽपि गृहागतं भगवन्तमवलोक्य त्रपाधोमुखः प्रण- म्योवाच-“भगवन् ! त्वदाश्रयोन्मत्तेन समुद्रेण मम भृत्यस्य अण्डानि अपहृत्य ममापमानो विहितः । परं भगवल्लज्जया मया विलम्बितं नोचेदेनमहं स्थलान्तरमद्यैव नयामि, यतः स्वामिभयाच्छुनोऽपि प्रहारो न दीयते। उक्तञ्च- ऐसा विचारकर गरुडके नगर रुक्मपुरमें गरुडके निकट बहुत शीघ्र गये। गरुड भी घर आये भगवान्को देख लज्जासे नीचे मुखकर प्रणाम कर बोला,- “भगवन् ! तुम्हारे आश्रयसे उन्मत्त हुए समुद्रने मेरे भृत्यके अण्डे लेकर मेरा अपमान किया। सो आपकी लज्जासेही देर करी नहीं तो इसे मैं आजही शुष्क करदूं, परन्तु स्वामीके भयसे कुत्तेको भी नहीं माराजाता। कहा है-