BharatKosha
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

Page 246 of 536

Read in context
Page 246

दयोऽपि तिरस्कृता अस्य उत्पतनेन” । बृहत्स्फिक् आह- “अथ ज्ञायते तस्य बिलं कस्मिंश्चित् प्रदेशे ?” ताम्रचूड आह-“भगवन् ! न वेद्मि सम्यक्” । स आह-“नूनं निधा- नस्य उपरि तस्य बिलम् । निधानोष्मणा प्रकूर्दते । उक्तञ्च- सो मूर्ख ! गर्वको प्राप्त होनेसे तू शोचनीय है सो मै तुम्हारे मठको त्याग जाऊगा” । तब यह सुन भयसे घबडाया हुआ ताम्रचूड उससे बोला-“भो भगवन् ! ऐसा मत कहो तुम्हारा समान मेरा अन्य प्रिय सुहृत् नहीं है । परन्तु सुनो जिस कारणसे तुम्हारे वचनके मुझसे उत्तर नहीं दिये जाते । यह दुरात्मा मूषक ऊचे स्थानमें धरे हुएभी भिक्षापात्रपर कूदकूद चढ जाता है और उसमें रक्खी हुई शेष भिक्षाको खाजाता है इस कारणसे मठमे मार्जन (बुहारी) भी नहीं लगती, सो मूषकके डरानेको इस वाससे बारवार भिक्षापात्रको ताडन करताहू । और कारण नहीं है । और इस दुरात्माका यह कुतूहल तो देखो जो विलाव वानर आदिभी इसने अपने कूदनेके आगे तिरस्कार कर दिये” । बृह- त्स्फिक् बोला-“किस देशमें उसका बिलहै सो जानते हो?”। ताम्रचूड बोला- “भगवन् मैं अच्छी प्रकार नहीं जानताहू” । वह बोला-“अवश्यही धनके ऊपर उसका बिल है । धनकी गरमीसे कूदता है । कहा है- उष्मापि वित्तजो वृद्धिं तेजो नयति देहिनाम् । किं पुनस्तस्य सम्भोगस्त्यागकर्मसमन्वितः ॥ ७१ ॥ धनकी गरमी मनुष्यके तेजको बढाती है और यदि उसका भोग और त्याग हो तो क्या कहना ॥ ७१ ॥ तथाच- और देखो- नाकस्माच्छाण्डिलीमातर्विक्रीणाति तिलैस्तिलान् । लुञ्चितानितरैर्यैन हेतुरत्र भविष्यति ॥ ७२ ॥” हे मात ! अकस्मात् शाण्डिली ब्राह्मणी धुले तिलोसे काले नहीं बदलती है इसमें अवश्य कोई कारण होगा ॥ ७२ ॥ ताम्रचूड आह,-“कथमेतत् ?” स. आह- ताम्रचूड बोला,-“यह कैसे” वह बोला-