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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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[Page Header] भाषाटीकासमेतम् । (२४५)

हुएपर अपने दुर्गमें उसके धनको ले आऊ जिससे फिरभी मेरे धनके प्रभावसे पूर्ववत् आधिपत्य हो जायगा, कहाहै कि- व्यथयन्ति परं चेतो मनोरथशतैर्जनाः । नानुष्ठानैर्धनैर्हीनाः कुलजा विधवा इव ॥ १०४ ॥ सैकडो मनुष्य मनोरथोंसे चित्तको व्यथित करते हैं, परन्तु धनहीनोंके अनुष्ठान नहीं होतेहैं जैसे अच्छे कुलमें उत्पन्न हुई विधवा ॥ १०४ ॥ दौर्गत्यं देहिनां दुःखमपमानकरं परम् । येन स्वैरपि मन्यन्ते जीवन्तोऽपि मृता इव ॥ १०५ ॥ दुर्गतिही देहधारियोंका परम दुःख और परम अपमान करनेवालीहै जिसके कारण जीते हुएही उसको बन्धु मृतवत् मानते हैं ॥ १०५ ॥ दैन्यस्य पात्र तामेति पराभूतेः परं पदम् । विपदामाश्रयः शश्वद्दौर्गत्यकलुषीकृतः ॥ १०६ ॥ दुर्गतिसे प्राप्त हुआ मनुष्य पराभवके स्थान और विपत्तिके परम आश्रयको निरन्तर प्राप्त होताहै ॥ १०६ ॥ लज्जन्ते बान्धवास्तेन सम्बन्धं गोपयन्ति च । मित्राण्यमित्रतां यान्ति यस्य न स्युः कपर्दकाः ॥ १०७॥ उससे बांधव लज्जित होतेहैं तथा उससे अपने सम्बन्धको छुपातेहैं बहुत क्या उसके मित्र अमित्र होजातेहैं जिसके पास कौडी नहीं होतीहै ॥ १०७ ॥ मूर्त्तं लाघवमेवैतदपायानामिदं गृहम् । पर्यायो मरणस्यायं निर्धनत्वं शरीरिणाम् ॥ १०८ ॥ दरिद्रकी यही मूर्ति, विपत्तियोंका यही घर है, यही मरणका दूसरा पर्यायहै, जो शरीरधारियोंको निर्धनताहै ॥ १०८ ॥ अजाधूलिरिव त्रस्तैर्मार्जनीरेणुवज्जनैः । दीपखद्योतछायेव त्यज्यते निर्धनो जनैः ॥ १०९ ॥ बकरीकी धूरिकी समान घबराये हुए तथा बुहारीकी धूरिकी समान दीप और पटबीजनेकी छायाकी समान दरिद्रको सब कोई त्याग देतेहैं ॥ १०९ ॥ शौचावशिष्टयाप्यस्ति किञ्चित्कार्यं क्वचिन्मृदा । निर्धनेन जनेनैव न तु किञ्चित्प्रयोजनम् ॥ ११० ॥

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