पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २४६ )' पञ्चतन्त्रम् । शौचसे अधशेष रही मृत्तिकासेभी कुछ कार्य सिद्ध हो सकताहै, परन्तु निर्धन मनुष्य किसी कामका नहीं होता ॥ ११० ॥ अधनो दातुकामोऽपि संप्राप्तो धनिनां गृहम् । मन्यते याचकोऽयं धिग्दारिद्र्यं खलु देहिनाम् ॥ १११ ॥ अधन (दरिद्री) देनेकी इच्छा करके धनियोंके घरमें आवे तोभी वह उसको याचकही मानते हैं देहधारियोंकी अवित्तताको धिक्कारहै ॥ १११ ॥ अतो वित्तापहारं विदधतो यदि मे मृत्युः स्यात् तथापि शोभनम् । उक्तञ्च- यदि चौर्य कर्म करते मेरी मृत्यु हो जाय तोभी अच्छाहै। कहाहै- स्ववित्तहरणं दृष्ट्वा यो हि रक्षत्यसून्ररः । पितरोऽपि न गृह्णन्ति तद्दत्तं सलिलाञ्जलिम् ॥ ११२ ॥ जो अपने धनको हरण होता देखकर प्राणोंकी रक्षा करताहै उसकी दीहुई अंजलि को पितर ग्रहण नहीं करते हैं ॥ ११२ ॥ तथाच- तैसेही- गवार्थे ब्राह्मणार्थे च स्त्रीवित्तहरणे तथा । प्राणांस्त्यजति यो युद्धे तस्य लोकाः सनातनाः ॥११३॥" गौ, ब्राह्मण, स्त्री तथा धनके हरण करनेमे और युद्धमें जो मनुष्य प्राणों- को त्यागता है उसको सनातन लोक प्राप्त होते हैं ॥ ११३ ॥" एवं निश्चित्य रात्रौ तत्र गत्वा निद्रावशं उपागतस्य पेटायां मया छिद्रं कृतं यावत् तावत् प्रबुद्धो दुष्टतापसः 'ततश्च जर्जरवंशप्रहारेण शिरसि ताडितः कथञ्चित् आयुःशेषतया निर्गतोऽहं न मृतश्च । उक्तंच- यह विचार रात्रिमें उस स्थानमें जाकर ज्योंहीं मैंने उस गठरीमें छिद्र किया त्योंही वह दुष्टात्मा जाग उठा और उस जर्जर वंशसे मेरे शिरमें प्रहार किया किसी प्रकार आयुके शेष होनेसे निकलगया मरा नहीं । कहा है- प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो देवोऽपि तं लंघयितुं न शक्तः ।