पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । ( २७३ ) धर्मार्थं यस्य वित्तेहा तस्यापि न शुभावहा । प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ॥ १७० ॥ जिस मनुष्यका धर्मके निमित्त धन उपार्जन करनाहै वह चेष्टा भी भली नहीं है क्योंकि कीचके धोनेसे तो दूरसे उसका न छूनाही भला है ॥ १७० ॥ दानेन तुल्यो निधिरस्ति नान्यो लोभाच्च नान्योऽस्ति रिपुः पृथिव्याम् । विभूषणं शीलसमं न चान्यत् सन्तोषतुल्यं धनमस्ति नान्यत् ॥ १७१ ॥ दानकी तुल्य दूसरा निधि नहीं है, लोभसे अधिक पृथ्वीमें कोई शत्रु नहीं है, शीलकी समान दूसरा गहना नहीं और सन्तोषकी समान दूसरा धन नहीं है ॥ १७१ ॥ दारिद्र्यस्य परा भूतिर्यन्मानद्रविणाल्पता । जरद्गवधनः शर्वस्तथापि परमेश्वरः ॥ १७२ ॥ मानरूपी धनकी अल्पताही दारिद्र्यका ऐश्वर्य है । शिव जीर्ण वृषभक धन- वाले होकरभी परमेश्वर हैं ( मानमे उन्नतहैं ) ॥ १७२ ॥ सकृत्कन्दुकपातेन पतत्यार्यः पतन्नपि । तथा पतति मूर्खस्तु मृत्पिण्डपतनं यथा ॥ १७३ ॥ श्रेष्ठ मनुष्य गेंदकी समान गिरकरभी फिर ऊपरको उछलताहै और मूर्ख तो ऐसे पतित होताहै कि जैसे मृत्पिण्ड गिरकर फिर नहीं उठताहै ॥ १७३ ॥ एवं ज्ञात्वा भद्र ! त्वया सन्तोषः कार्य्यः ” इति । मन्थ- रकवचनमाकर्ण्य वायस आह-“भद्र ! मन्थरको यत् एवं वदति तत् त्वया चित्ते कर्त्तव्यम् । अथवा साधु इदमुच्यते- ऐसा जानकर हे भद्र ! आपको सन्तोष करना चाहिये” । मन्थरकके वचन सुनकर वायस बोला-“भद्र ! मन्थरक जो कहताहै वह तुझको चित्तमे करना चाहिये । अथवा यह सत्य कहाहै- सुलभाः पुरुषा राजन्सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥ १७४ ॥ हे राजन् ! निरन्तर प्रियबोलनेवाले पुरुष बहुत हैं परन्तु सुननेमें अप्रिय वास्तवमें हितकारी वचनके कहने सुननेवाले दुर्लभ हैं ॥ १७४ ॥ १८