पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २७४ ) पञ्चतन्त्रम् । अप्रियाण्यपि पथ्यानि ये वदन्ति नृणामिह । त एव सुहृदः प्रोक्ता अन्ये स्युर्नामधारकाः ॥ १७५ ॥ ” इस संसारमें जो मनुष्य अप्रिय तथा हितकारी वाक्योंको कहतेहैं वेही सुहृ- दहैं दूसरे नामधारीहैं ॥ १७५ ॥ ” अथ एवं जल्पतां तेषां चित्रांगो नाम हरिणो लुब्धकत्रा- सितः तस्मिन् एव सरसि प्रविष्टः । अथ आयान्तं ससम्भ्रम- मवलोक्य लघुपतनको वृक्षमारूढः । हिरण्यको निकटवर्तिनं शरस्तम्बं प्रविष्टः । मन्थरकः सलिलाशयमास्थितः । अथ लघुपतनको मृगं सम्यक् परिज्ञाय मन्थरकं उवाच,-“एहि एहि सखे मन्थरक ! मृगोऽयं तृषार्त्तोऽत्र समायातः सरसि प्रविष्टः । तस्य शब्दोऽयं न मानुषसम्भवः” इति । तच्छ्रुत्वा मन्थरको देशकालोचितमाह,-“भो लघुपतनक ! यथा अयं मृगो दृश्यते प्रभूतं उच्छ्वासं उद्वहन् उद्भ्रान्तदृष्ट्या पृष्ठतोऽ- वलोकयति तन्न तृषार्त्त एष नूनं लुब्धकत्रासितः । तज्ज्ञाय- तामस्य पृष्ठे लुब्धका आगच्छन्ति न वा इति । उक्तञ्च- इस प्रकार उनके वचन कहनेपर चित्राङ्ग नामक एक हरिण लुब्धकसे घबराया हुआ उस सरोवरमे प्रविष्ट हुआ । तब उसको भयसे व्याकुल आया हुआ देखकर लघुपतनक वृक्षपर चढा, हिरण्यक समीपवर्ती शरके स्तम्बमे प्रविष्ट हुआ, मन्थरक सरोवरमे घुस गया । तब लघुपतनक मृगको अच्छी प्रकार जानकर मन्थरकसे बोला,-“आओ आओ सखे मन्थरक ! यह मृग तृषासे व्याकुल यहां आकर सरोवरमें प्रविष्ट हुआहै । यह उसीका शब्दहै यहां मनु- ष्यका सम्भव नहींहै” । यह सुनकर मन्थरक देशकाल उचित बचन बोला,- “भो लघुपतनक ! जिसप्रकार यह मृग दीखताहै, बडे श्वास लेताहुआ चकित दृष्टिसे पीछेको देखताहै सो यह प्यासा नहींहै अवश्यही व्याधसे भीतहै । सो जानाजाय कि इसके पीछे लुब्धक आते हैं या नहीं । कहा है- भयत्रस्तो नरः श्वासं प्रभूतं कुरुते मुहुः । दिशोऽवलोकयत्येव न स्वास्थ्यं व्रजति क्वचित् ॥ १७६ ॥ भयसे व्याकुल हुआ मनुष्य बारंबार श्वास लेताहै चारों ओर दिशाओंको देखता रहता है और स्वास्थ्यको प्राप्त नहीं होताहै ॥ १७६ ॥