पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । ( ३६१ )
स्कन्धे समारोह" । इति जल्पन् अनिच्छन्तमपि देवदत्त- मलिंग्य बलात् स्वकीयस्कन्धे आरोपितवान् । ततश्च नृत्यं कृत्वा,-"हे ब्रह्मव्रतधराणां धुरीण ! त्वयापि मयि उपकृतं" इत्यादि उक्त्वा स्कन्धात् उत्तार्य्य, यत्र यत्र स्वजनगृहद्वारा- दिषु बभ्राम, तत्र तत्र तयोः उभयोरपि तद्गुणवर्णनमकरोत्। अतोऽहं ब्रवीमि- तब वह सबेरेही उठकर अपने घरसे निकला । वहभी उसको गया जान श्रृंगारकर किसी प्रकार दिन बिताती हुई और पूर्वपरिचित जारके घर जाकर उससे मिली ( बोली ) -"वह दुरात्मा मेरा पति ग्रामान्तरको गया है तू हमारे घर जनोंके सोजानेपर आजाना"। वैसाही हुआ । और वह रथकार वनमेंही दिन व्यतीतकर रात्रिको अपने घरमें दूसरे द्वारसे प्रवेश कर सेजके नीचे मौन होकर स्थित हुआ । इसी समय देवदत्त ( जार ) आकर उस सेजपर आया । उसको देख क्रोधपूर्णचित्त बढई विचारने लगा "क्या इसको उठकर मारू अथवा लीलासे सोते हुए दोनोंहीको मारू । अच्छा इनकी चेष्टा तो देखू । इनके साथकी बात सुनू"। इसी समय वह घरका दरवाजा मूदकर सेजपर आरूढ हुई । तब उसके उसपर चढनेमे रथकारके शरीरमें पाव लगा । तब वह विचारने लगी "अवश्य यह दुरात्मा रथकार मेरी परीक्षाके निमित्त स्थित है सो कोई स्त्रीचरित्रका कौशल करू"। इस प्रकार उसके विचारनेपर वह देवदत्त उसके स्पर्शमें उत्कंठित हुआ । तब उसने हाथ जोडकर कहा-"भो ! महानु- भाव ! तुम मेरा शरीर मत छुओ, जो कि मैं पतिव्रता महा सती हू । नहीं तो शाप देकर तुमको भस्म कर दूंगी"। वह बोला,-"जो ऐसा है तो तैने मुझे क्यों बुलाया ?" । वह बोली- "भो ! एकाग्र मनसे सुनो । मैं आज सबेरे देवता दर्शनको चण्डीके मन्दिरमें गई वहां अकस्मात् आकाशवाणी हुई-"पुत्री ! मैं क्या करू तू मेरी भक्त है परन्तु छः महीनेके बीचमें प्रारब्धके कारण तू विधवा होगी" तब मैंने कहा-"भगवति ! जो तू आपत्तिको जानती है, तो उसका निवारणभी जानती है क्या है ऐसा कोई उपाय है जिससे मेरा पति सौ वर्षतक जिये ?" । तब उसने कहा- "वत्से ! होता हुआभी नहीं है । क्यों कि उसका उपाय तेरे अधीन है"। यह सुनकर मैंने कहा,-"देवि ! यदि