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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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( ३६२ ) पञ्चतन्त्रम् । वह मेरे प्राणोंसेभी हो, तो आज्ञा दे जिससे मैं करूं”। तब देवीने कहा जो आजके दिन परपुरुषके साथ एक खाटपर आरूढ हो आलिंगन करे तो तेरे भर्त्ताकी अपमृत्यु उस परपुरुषमें चली जाय तेरा भर्त्ताभी फिर सौवर्षतक जिये”। इस कारण मैने तुमको बुलाया है। सो जो कुछ करनेकी इच्छा हो सो कर। देवताका वचन अन्यथा न होगा यह निश्चय है,” तब भीतर हँसीसे खिले मुखवाला यह उससे उचित आचरण करता हुआ। वह मूर्ख रथकारभी उसके वचन सुन पुलकित शरीर हो शय्याके नीचेसे निकल उससे बोला,–“धन्य पतिव्रते धन्य ! कुलकी आनन्द देनेवाली धन्य ! मैं दुर्जनोंके वचनोंसे शंकित हृदयहो तेरी परीक्षाके निमित्त ग्रामान्तर जानेका वहाना करके इस खाटके नीचे एकान्तमें छिपगया था। सो आ मुझे आलिंगन कर, तू अपने स्वामीकी भक्ति करनेवाली स्त्रियोंमें मुख्य है ऐसा तप- रूप व्रत परपुरुषके संग करती हुई। मेरी आयुके बढानेके निमित्त तथा अप- मृत्यु नाशके निमित्त तैने ऐसा किया”। उससे ऐसा कह स्नेहसे आलिंगन करता हुआ अपने कन्धेपर उसे चढाकर उस देवदत्तसे बोला-“भो महा- नुभाव ! मेरे पुण्यसे तुम यहां आये तुम्हारे प्रसादसे मैंने सौ वर्षकी आयु प्राप्त की। सो तू भी मुझे आलिंगन कर मेरे कन्धेपर चढ”। ऐसा कह नहीं इच्छा करनेपरभी देवदत्तको आलिंगन कर बलसे अपने कन्धेपर चढाता हुआ। फिर नृत्य करके हे ब्रह्मव्रत धारण करनेवालोंमें अग्रणी तुमनेभी मेरा उपकार किया ऐसा कह कर कन्धेसे उतार जहां तहां अपने स्वजनोंके गृहद्वारमें घूमने लगा। वहां वहां उन दोनोंके ही उन गुणोंका वर्णन करता भया। इससे मैं कहताहूं कि- प्रत्यक्षेऽपि कृते पापे मूर्खः साम्ना प्रशाम्यति । रथकारः स्वकां भार्य्यां सजारां शिरसावहत् ॥ २०६ ॥ कि पाप देखकर भी मूर्ख साम उपायसे शान्त हो जाता है रथकारने (इस प्रकार ) जारसहित अपनी भार्याको शिरपर उठाया ॥ २०६ ॥ तत सर्वथा मूलोत्खाता वयं विनष्टाः स्मः । सुष्ठु खलु इदमुच्यते-