पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
DevanagariHindipublished536 pages
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[Header] भाषाटीकासमेतम् । (५११)
- स्पृश्यतेऽयं पटहो यदि कथमपि दैवात् कन्या लभ्यते तथा सुवर्णप्राप्तिश्च भवति, सुखेन सुवर्णप्राप्त्या कालो व्रजति । अथ यदि तस्या दोषतो मृत्युर्भवति दारिद्र्योपात्तस्य अस्य क्लेशस्य पर्यन्तो भवति । उक्तञ्च- इस कारण स्वामी ! इसके दर्शनको त्यागिये और जो इसे विवाहनेकी इच्छा करे तो वह उसे देकर देश त्यागकी आज्ञा दो ऐसा करनेपर दोनों लोकोंमें अविरुद्धता होगी" । तब उनके यह वचन सुनकर वह राजा बाजेके शब्दसे सर्वत्र घोषणा करानेकी आज्ञा देता हुआ- "अहो ! इस तीन स्तनवाली कन्याको जो विवाह करेगा वह लाख अशरफी पावेगा ( परन्तु ) देश त्याग करना होगा" । इस प्रकार उसकी घोषणाको बहुत समय बीत गया । किसीने उसको ग्रहण न किया । वहभी युवा अवस्थाको प्राप्त होकर गुप्त स्थानमें स्थित हुई यत्नसे रक्षित थी । उसी नगरमें एक अन्धा था । उसके पास एक मन्थरक नामवाला कुबडा लकडी पकडा कर आगे चलनेवाला था । उन्होंने उस वाद्य- शब्दको सुनकर परस्पर विचारा । "यह शब्द जो घोषित होता है सो यदि हम पटहको स्पर्श करें तो इसके अनुसार प्रारब्धसे कन्या प्राप्त हो जाय तो सुवर्णके लाभसे हमारा समय सुख भोगते बीतेगा और जो यदि उसके दोषसे मृत्यु हो जाय तो दरिद्रतासे प्राप्त हुए इस क्लेशका अन्त होजायगा । कहा है- लज्जा स्नेहः स्वरमधुरता बुद्धयो यौवनश्रीः कान्तासंगः स्वजनममता दुःखहानिर्विलासः । धर्मः शास्त्रं सुरगुरुमतिः शौचमाचारचिन्ता पूर्णे सर्वे जठरपिठरे प्राणिनां संभवन्ति ॥ ९८ ॥ लज्जा, स्नेह, स्वरकी मधुरता, बुद्धि, यौवनकी लक्ष्मी, कान्ताका संग, स्वजनकी ममता, दुःखहानि, विलास, धर्मशास्त्र, देव गुरुमें भक्ति, पवित्रता, सदाचारका अनुष्ठान यह सब प्राणियोंके पेट भरनेमें होते हैं ॥ ९८ ॥ एवमुक्त्वा अन्धेन गत्वा स पटहः स्पृष्टः । "भो ! अहं तां कन्याम् उद्वाहयामि यदि राजा मे प्रयच्छति" । ततस्तैः राजपुरुषैः गत्वा राज्ञे निवेदितम्,- "देव! अन्धकेन केनचित् पटहः स्पृष्टः । तदत्र विषये देवः प्रमाणम्" । राजा प्राह-