फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
by मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास)
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Read in context१२ १७. सत्रहवाँ अध्याय : निर्याण प्रकरण । किसी भाव का नाश काल-शनि, गुरु, चन्द्र गोचर वश निर्याण काल-लग्नेश, यमकण्टक, चन्द्र, शनि की राशि, अंश, कला से मृत्यु का समय-सूर्य और यम कण्टक स्फुट से मृत्यु काल-लग्न स्पष्ट, सूर्य स्पष्ट तथा मान्दि स्पष्ट से निर्याण काल-अन्य योग-मान्दि और शनि से मृत्यु काल निर्णय-सूर्य गोचर-गृह स्पष्ट, राहु स्पष्ट से फल-जन्म कालीन शनि, शुक्र, अष्टमेश, व्ययेश तथा षष्ठेश से मृत्यु सम्बन्धी फलादेश । पृ० ३२२-३३४ १८. अठारहवाँ अध्याय : द्विग्रहयोग । सूर्य की चन्द्र, मंगल, बुध, गुह, शुक्र या शनि से युति का फल- चन्द्र यदि मगल, बुध, गुरु, शुक्र या शनि के साथ हो-मंगल का यदि बुध, गुरु, शुक्र या शनि से योग हो- बुध की यदि गुरु, शुक्र या शनि से युति हो- गुरु, शुक्र योग-गुरु शनि योग-शुक्र शनि युति । विविध राशि स्थित चन्द्रमा पर अन्य ग्रहों की दृष्टि का फल। चन्द्रमा की भिन्न-भिन्न नवांश स्थिति और उस पर अन्य ग्रहों की दृष्टि का फल-सूर्य नवांश स्थिति, लग्न नवांश स्थिति-द्वादशांश फल । पृ० ३३५-३४५ १९. उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल विंशोत्तरी महादशा निकालने का प्रकार-सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु तथा केतुका, नैसर्गिक गुण, प्रकृति के अनुसार महादशा फल-सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र- विंशोत्तरी दशाक्रम के अनुसार विशेष फल । भावार्थ रत्नाकर के विविध लग्नों के लिये विशेष योग-मेष लग्न में लिये २२ योग-वृष लग्न के १४-मिथुन के ८-कर्क के १३-सिंह लग्न के ८-कन्या के ६-