फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० १५. पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता । भाव फल उत्तम कब होता है-बली या निर्बल भाव के लक्षण- भावनाश-भाव हानि का काल-सौम्य हो या क्रूर लग्नेश जिस भाव में बैठता है उसकी वृद्धि करता है-ग्रह यदि दो भावों का स्वामी हो तो पहिले किस का फल करेगा-भाव सन्धि स्थित ग्रह-सूर्य आदि ग्रह किन-किन विषयों के कारक हैं-लग्न आदि द्वादश भावों के कारक ग्रह- षष्ठाष्टम द्वादश में विशेष फल-प्रत्येक भाव से द्वादश भाव गणना- कारक से विचार-कारक से द्वादश भाव गणना और उन भावों का विचार-यदि कारक उस भाव में बैठा हो जिस का वह कारक है । दो भावों का स्वामी ग्रह यदि अपनी सुस्थान स्थित राशि में हो तो दुःस्थानाधिप होने का दोष नहीं-पाँच प्रकार का सम्बन्ध । पृ० २८५-३०५ १६. सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल। लग्न भाव का शुभाशुभ फल-लग्नेश के शुभ सम्बन्ध का फल- सुस्थान या दुःस्थान स्थित लग्नेश-धन भाव फल- धनेश का विविध ग्रहों से सम्बन्ध-तृतीयेश भाव फल-तृतीयेश लग्नेश युति का प्रभाव-बलवान् तृतीयेश-चतुर्थ भाव-सुखेश स्थिति वश शुभाशुभ-माता, पिता, पुत्र आदि का विचार-चतुर्थ भाव के लिये शुक्र का विचार-पंचम भाव, भावाधीश से फलादेश-षष्ठ भावेश तथा लग्नेश के बलाबल वश शत्रु, रोग, स्वास्थ्य विचार-सप्तम भाव फल-अष्टमेश स्थिति वश शुभाशुभ- नवम भाव फल-पिता सुख-क्या जातक गोद जावेगा-दशम भाव विचार जातक के उच्च पद प्राप्ति योग-लाभ भाव फल-व्यय भाव फल-भाव सिद्धि काल-गोचरवश फलादेश-लग्नेश की तथा अन्य भावेशों की गोचर स्थिति । पृ० ३०६-३२१