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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

by मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास)

DevanagariHindipublished684 pages

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का फल उस से मिलता जुलता फल मेष राशि (मेष में चन्द्रमा हो) का भी कहना चाहिये । इसी कारण ऊपर के बारहों श्लोकों का भावार्थ देते हुए हमने लग्न और राशि दोनों का एक साथ फल दे दिया है। ॥१३॥ अब ग्रहों का फलादेश कहते हैं। यदि ग्रह अपनी उच्चराशि में हो तो जातक रत्नगर्भा* (पृथ्वी) का स्वामी होता है; राजा लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और उसके पास बहुत सी कीमती सम्पत्ति रहती है। जातक में बहुत से विशिष्ट गुण होंगे और नीति, यश, विक्रम, दानशीलता, धैर्य तथा चतुरता में वह महाराज विक्रमादित्य की तरह तेजस्वी होगा।** अब स्वराशि गत ग्रह का फलादेश कहते हैं। यदि ग्रह अपनी राशि में हो तो उसकी दशा में प्रभु (विशिष्ट पुरुष) के अनुग्रह से शक्ति, उच्च स्थिति और गृह का दृढ़ सुख होता है अर्थात् ऐसा जातक आराम से अपने घर में बैठा रहता है। पहले के समय में घर में आराम से बैठना सबसे बड़ा सुख समझा जाता था। इसके अतिरिक्त स्वगृही ग्रह का फल यही होना चाहिए कि स्वगृह में बैठावे अर्थात् अपने घर में आराम से रक्खे, परदेश में न घुमावे । नवीन मकान प्राप्त हो और ऐसी नवीन भूमि प्राप्त हो जिसमें सब प्रकार की फसलें पैदा होती हों। स्वगृही ग्रह की दशा में मनुष्य लोकसम्मान प्राप्त करता है और यदि पहले की अनिष्ट महादशा में कोई वस्तु नष्ट हो गई हो तो वह भी उसे पुनः प्राप्त हो जाती है। ॥ १५ ॥

  • रत्नगर्भा का यह भी अर्थ हो सकता है कि जिसके गर्भ में अर्थात् तहखानों में रत्न भरे हों और उच्चराशि का ग्रह मनुष्य को धनिक बनाता है। ** उच्चग्रह की जो इतनी प्रशंसा लिखी है वह वास्तव में तभी फलीभूत होती है जब वह उत्तम घर का स्वामी हो और उत्तम स्थान पर बैठा भी हो, साथ ही नवांश आदि वर्गों में भी बलवान् हो ।