फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
by मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास)
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Read in context२१४ फलदीपिका अब मित्र राशि में स्थित ग्रह का फल बताते हैं। यदि ग्रह अपने मित्र की राशि में हो तो मित्रों द्वारा कार्य सिद्धि होती है और नवीन मित्र भी पैदा होते हैं। इसके कारण उत्तम पुत्र, स्त्री सुख, धन सुख, धान्य सुख तथा भाग्योदय होता है और सब जनों की अनुकूलता रहती है। ।। १६ ।। अब शत्रु राशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। यदि ग्रह शत्रु राशि में हो तो मनुष्य दूसरे के अन्न पर (दूसरे की सेवा पर) निर्भर रहता है; उसे दूसरे के मकान में पड़ा रहना पड़े। अकिंचनता(दरिद्रता) हो और ऐसा जातक शत्रुओं से पीड़ा पाता रहे। जो उसके प्रिय मित्र भी हों वह भी शत्रु हो जायें अर्थात् मित्रों से लाभ कुछ न हो बल्कि उनके व्यवहार से कष्ट हो। शत्रुओं से पीड़ा हो। ।। १७ ।। *अब नीच राशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। यदि ग्रह नीच हो तो उसकी दशा में अधःपतन होता है अर्थात् स्थिति में गिरावट होती है। इसका फल दीनता, दुराचार और कर्जदारी भी है। अर्थात् नीच ग्रह की दशा में बुद्धिविपर्यय होने के कारण मनुष्य कुत्सित आचरण करता है, धन की कमी के कारण ऋण भार से दबना पड़ता है। नीच ग्रह की दशा में नीच जनों की मातहती करनी पड़ती है। कुत्सित देश में रहना पड़ता है। कष्टपूर्ण यात्रायें करनी पड़ती है; दूसरे का भृत्यत्व (नौकरी का कष्ट—प्रायः मातहती) उठानी पड़ती है और अनर्थ परम्परा उपस्थित होती है। ।।१८ ।।
- यहां जो मित्र राशि शब्द आया है उससे नैसर्गिक मित्र राशि समझना चाहिए। यदि तात्कालिक मित्र भी हो तो और भी उत्तम, यदि मित्र की राशि में होकर नीच राशि में हो जैसे शुक्र कन्या में। बुध शुक्र का मित्र है और बुध की राशि कन्या में शुक्र मित्र गृही किन्तु नीच हुए तो श्लोक १६ में वर्णित फल नहीं होगा। नीच राशि स्थित ग्रह के लिए देखिये श्लोक १८।