फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
by मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास)
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Read in contextनवाँ अध्याय : राशिफल २१५ अब मूढ़* ग्रह और समराशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। (क) यदि कोई ग्रह अस्त हो तो उस ग्रह की दशा लगते ही शीघ्र ही मृत्यु (या मृत्यु समान कष्ट) हो। स्त्री, सुत, धन तीनों से हीनता हो अर्थात् इन सबके कारण भी दुःख उठाना पड़े। व्यर्थ कलह हो, अपवाद लगे और जातक की हार या अपमान हो। (ख) अब समराशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। जो ग्रह न मित्र हो न शत्रु हो वह सम कहलाता है। समराशि स्थित ग्रह की दशा में कोई विशेष भला या विशेष बुरा फल नहीं होता। न वह विशेष सुख उत्पन्न करने में समर्थ होता और न विशेष दुःख ही उत्पन्न करता है। जैसी स्थिति ग्रह की दशा लगने के पहले रहती है वैसी ही कायम रहती है। ॥ १९ ॥ अब वक्रीग्रह तथा वर्गोत्तम ग्रह का फल बताते हैं। (क) चाहे ग्रह शत्रु राशि में हो, चाहे ग्रह नीच राशि में हो, चाहे ग्रह शत्रु राशि, नीच राशि दोनों में हो यदि वह वक्री है तो उच्च ग्रह (उच्चराशि स्थित ग्रह) के समान उत्तम फल करेगा। (ख) यदि ग्रह वर्गोत्तम* में हो—अर्थात् जिस राशि में हो उसी नवांश में भी हो तो वह स्वगृही ग्रह के समान जोरदार शुभ फल करता है। ॥ २० ॥ नीचे लिखे अंशों में ग्रह वर्गोत्तम होता है। अंश कला अंश कला मेष राशि ०- ० से ३-२० तक वृषभ ,, १३-२० से १६-४० मिथुन ,, २६-४० से ३०- ० कर्क ,, ०- ० से ३-२०
- जो ग्रह सूर्य के इतने समीप होता है कि २४ घंटे में कभी भी दिखाई न दे वह अस्त कहलाता है। अस्त ग्रह का प्रभाव प्रायः अच्छा नहीं होता। इसी अस्त ग्रह को कोई मूढ़, कोई विकल कहते हैं।
- मेषराशि, मेष नवांश; वृष राशि वृष नवांश; मिथुन राशि मिथुन नवांश; कर्क राशि कर्क नवांश; इस प्रकार ग्रह जिस राशि में हो उसी नवांश में भी हो तो वर्गोत्तम कहलाता है।