प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
by आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (origin)
Page 80 of 86
Read in contextप्रबोधसुधाकर उदासीनः स्तब्धः सततमगुणः सङ्गरहितो भवांस्तातः कातः परमिह भवेज्जीवनगतिः । अकस्मादस्माकं यदि न कुरुते स्नेहमथ त- द्वसस्व स्वीयान्तर्विमलजठरेऽस्मिन्पुनरपि ॥२४५॥ आप हमारे पिता तो उदासीन, निष्क्रिय, सदा निर्गुण और असंग ठहरे; अतः अब हमारे जीवनकी और क्या गति होगी। अच्छा यदि आप हमसे अकारण ही स्नेह नहीं कर सकते तो अपने निर्मल निवास-स्थानरूप इस अन्तःकरणमें तो बसो । लोकाधीश त्वयीशे किमिति भवभवा वेदना स्वाश्रितानां सङ्कोचः पङ्कजानां किमिह समुदिते मण्डले चण्डरश्मेः। भोगः पूर्वार्जितानां भवति भुवि नृणां कर्मणां चेदवश्यं तन्मे दृष्टैर्नृपुष्टैर्ननु दनुजनृपैरूर्जितं निर्जितं ते ॥२४६॥ आप लोकाधीश स्वामीके रहते हुए आपके आश्रितोंको संसारजन्य क्लेश क्यों उठाना पड़ता है ? क्या सूर्यमण्डलके उदय होनेपर भी कमल कभी मुरझाते हैं ? यदि कहो कि संसारमें मनुष्योंको अपने पूर्वकृत कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है, तो मनुष्योंके मांससे पुष्ट हुए उन मेरे जाने हुए दैत्यराजोंने अवश्य आपके बलको जीत लिया था । ७०