BharatKosha
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

by आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished86 pages

Page 82 of 86

Read in context
Page 82

प्रबोधसुधाकर पुत्रान्पौत्रमथ स्त्रियोऽन्ययुवतीर्वित्तान्यथोऽन्यद्धनं भोज्यादिष्वपि तारतम्यवशतो नालं समुत्कण्ठया । नैतादृग्यदुनायके समुदिते चेतस्यनन्ते विभौ सान्द्रानन्दसुधार्णवे विहरति स्वैरं यतो निर्भयम् ॥ पुत्र, पौत्र, स्त्रियाँ, अन्य युवतियाँ, विभव तथा अन्य प्रकार- के धन और भोज्य आदि पदार्थोंमें तारतम्य होनेसे इनमें कभी उत्कण्ठाकी शान्ति नहीं होती; किन्तु अनन्त और अति गम्भीर आनन्दामृतसिन्धु श्रीयदुनायकके चित्तमें उदय होकर स्वच्छन्द विहार करनेपर ऐसा नहीं होता, क्योंकि उस समय चित्त स्वच्छन्द एवं निर्भय हो जाता है। काम्योपासनयार्थयन्त्यनुदिनं किञ्चित्फलं स्वेप्सितं केचित्स्वर्गमथापवर्गमपरे योगादियज्ञादिभिः । अस्माकं यदुनन्दनाङ्घ्रियुगलध्यानावधानार्थिनां किं लोकेन दमेन किं नृपतिना स्वर्गापवर्गैश्च किम् ॥ कोई लोग तो सकाम उपासनाके द्वारा नित्यप्रति अपने किसी अभीष्ट फलकी प्रार्थना किया करते हैं, और कोई योग तथा यज्ञादि अन्य साधनोंसे स्वर्ग और अपवर्गकी याचना करते हैं। किन्तु श्रीयदुनाथके चरण-कमलोंके ध्यानमें ही सावधान रहनेके इच्छुक हमलोगोंको लोकसे, दमसे, राजासे, स्वर्गसे और अपवर्गसे क्या काम है ? ७२