BharatKosha
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

DevanagariHindipublished131 pages

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६४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४


(विभूत्यनुभवप्रकारः) कथं महिमानमनुभवतीत्युच्यते; यन्मित्रं पुत्रादि वा पूर्वं दृष्टं तद्वासनावासितः पुत्रमित्रादिवासनासमुद्भूतं पुत्रं मित्रमिव वाविद्यया पश्यतीत्येवं मन्यते । तथा श्रुतमर्थं तद्वासनयानुशृणोतीव । देशदिगन्तरैश्च देशान्तरैर्दिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनस्तत्प्रत्यनुभवतीवाविद्यया । तथा दृष्टं चास्मिञ्जन्मन्यदृष्टं च जन्मान्तरदृष्टमित्यर्थः; अत्यन्तादृष्टे वासनानुपपत्तेः; एवं श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चास्मिञ्जन्मनि केवलैन मनसा अननुभूतं च मनसैव जन्मान्तरेऽनुभूतमित्यर्थः । सच्च परमार्थोदकादि, असच्च मरीच्युदकादि । किं बहुनोक्तानुक्तं सर्वं पश्यतिवह अपनी विभूतिका किस प्रकार अनुभव करता है ? सो अब बतलाते हैं—जिस मित्र या पुत्रादिको उसने पहले देखा होता है उसीकी वासनासे युक्त हो वह पुत्र-मित्रादिकी वासनासे प्रकट हुए पुत्र या मित्रको मानो अविद्यासे देखता है—ऐसा समझता है । इसी प्रकार सुने हुए विषयको मानो उसीकी वासनासे सुनता है तथा दिग्देशान्तरोंमें यानी भिन्न-भिन्न दिशा और देशोंमें अनुभव किये हुए पदार्थोंको अविद्यासे पुनः-पुनः अनुभव-सा करता है । इसी प्रकार दृष्ट—इसी जन्ममें देखे हुए एवं अदृष्ट अर्थात् जन्मान्तरमें देखे हुए, क्योंकि अत्यन्त अदृष्ट पदार्थोंमें वासनाका होना सम्भव नहीं है, तथा श्रुत-अश्रुत, अनुभूत—जिसका इसी जन्ममें केवल मनसे अनुभव किया हो, अननुभूत—जिसका मनसे ही जन्मान्तरमें अनुभव किया हो, सत्—जल आदि वास्तविक पदार्थ और असत्—मृगजलादि, अधिक क्या कहा जाय—ऊपर कहे हुए अथवा नहीं कहे हुए सभी पदार्थोंको
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