भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 131 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 75

प्रश्न ४] 'शाङ्करभाष्यार्थ ६५


| सर्वः पश्यति सर्वमनोवासनो- | वह सर्वरूपसे मनोवासनारूप | | पाधिः सन्नेवं सर्वकरणात्मा | उपाधिवाला होकर देखता है। इस | | मनोदेवः स्वप्नान्पश्यति ॥ ५ ॥ | प्रकार यह सर्वेन्द्रियरूप मनोदेव | | | स्वप्नोंको देखा करता है ॥ ५ ॥ |


सुषुप्तिनिरूपण

स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति ॥ ६ ॥

जिस समय यह मन तेज (पित्त) से आक्रान्त होता है उस समय यह आत्मदेव स्वप्न नहीं देखता। उस समय इस शरीरमें यह सुख (ब्रह्मानन्द) होता है ॥ ६ ॥

| स यदा मनोरूपो देवो यस्मिन्काले सौरेण पित्ताख्येन तेजसा नाडीशयेन सर्वतोऽभिभूतो भवति तिरस्कृतवासनाद्वारो भवति तदा सह करणैः मनसो रश्मयो हृद्युपसंहृता भवन्ति। यदा मनो दार्वग्निवदविशेषविज्ञानरूपेण कृत्स्नं शरीरं व्याप्यावतिष्ठते तदा सुषुप्तो भवति। अत्रैतस्मिन्काल एष मनआक्यो देवः स्वप्नान्न पश्यति दर्शनद्वारस्य निरुद्धत्वात् | जिस समय वह मनरूप देव नाडीमें रहनेवाले पित्त नामक सौर तेजसे सब ओरसे अभिभूत अर्थात् जिसकी वासनाओंकी अभिव्यक्तिका द्वार लुप्त हो गया है—ऐसा हो जाता है उस समय इन्द्रियोंके सहित मनकी किरणोंका हृदयमें उपसंहार हो जाता है। जिस समय मन काष्ठमें व्याप्त अग्निके समान निर्विशेष विज्ञानरूपसे सम्पूर्ण शरीरको व्याप्त करके स्थित होता है उस समय वह सुषुप्ति-अवस्थामें पहुँच जाता है। यहाँ अर्थात् इस समय यह मन नामवाला देव स्वप्नोंको नहीं देखता, क्योंकि |