प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
Page 151 of 178
Read in context( 164 ) नखैः वक्षसः भीमान्तर वज्राग्रैः दार्यमाणविष्मृात् शैलात् शिला पाट्यते । (३) अन्वय-(एषः) शत्रुम् क्रीडामयूरम् इव अचिन्तयित्वा । स्ववीर्यस परमं प्रयत्न कृत्वा, निशाचरपतेः दीप्त तेजः अवधूय नागेन्द्रभग्नवनवृक्षः अवसन्नः । (४) हिन्दी अर्थ (इसके बाद दो वृद्ध तपस्वी प्रवेश करते है) दोनो—आप लोग बचाइए, बचाइए । पहला—यह सीता रावण के द्वारा बलपूर्वक हरी जा रही है, जैसे सिंह के द्वारा कोई हरिणी हो । यह रावण नील कमलों की माला के समान श्याम वर्ण का है । हँसने के समय कमल तन्तु की तरह श्वेत दन्त पंक्ति वाला है एव आधी रात को विचरण करने वाला है । (१) दूसरा—यह देवी सीता, छटपटाती हुई नागिन की तरह, कांपती हुई पुष्पलता की तरह, पापी (२) दशानन रावण के द्वारा तपोवन से तपस्या की फल सिद्धि की तरह जबर्दस्ती ले जाई जा रही है । (२) दोनों—आप लोग बचाइए, बचाइए । पहला—(ऊपर देख कर) अरे, हमारे पुकारते ही यह जटायु दशरथ से उऋण होने के लिए "मेरे रहते तू कहाँ जायेगा" इस तरह रावण को ललकार आकाश मे उड़ा । दूसरा—यह रावण क्रोध से आंखें निकाल कर वापस लौटा । पहला—यह रावण है । दूसरा—यह जटायु है । दोनों—हाय, आकाश मे ही युद्ध छिद गया । पहला—काश्यप, काश्यप, गृध्रराज जटायु के पराक्रम को देखो । यह अपने पखो से रावण पर प्रहार करता हुआ उससे वीरतापूर्वक द्वन्द्व युद्ध कर रहा है । खूब डट कर अपने तीखे चंचु युगल द्वारा उसे काट खाने की चेष्टा कर रहा है। वह लौह कण्टक युक्त नखो से रावण की छाती पर भयानक तथा विस्तृत घाव इस तरह पैदा कर