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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages

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रहा है, मानो वज्र की नोकों द्वारा कठोर शिला फाड़ी जा रही हो । (३)

  • अरे, क्रोधित रावण ने जटायु के दाहिने कन्धे पर तलवार का प्रहार कर दिया ।
  • हाय, धिक्कार है । यहं जटायु तो गिर पड़ा । ला - अरे, बड़ा दुख है । यह पूज्य जटायु 'सचमुच में—अपने पराक्रम के समान पूरी तरह से प्रयास करके, खिलौने के बने मोर के समान शत्रु रावण की परवाह न करके, राक्षसराज की प्रचण्ड शक्ति को दबा कर उसी प्रकार समाप्त हो गया है, जैसे किसी गजराज के द्वारा उत्पादित कोई वन वृक्ष उखाड़ कर फेंका गयां हो । (४) दोनों—इसे स्वर्ग प्राप्त हो । पहला—काश्यप, आओ । ये समाचार श्री राम को दे । दूसरा—अच्छा । यह तो पहला काम है । (दोनों निकल जाते है) (विष्कम्भक समाप्त हुआ) (2) मूल (ततः प्रविशति काञ्चुकीयः) काञ्चुकीयः—क इह भोः ! काञ्चनतोरणद्वारमशून्यं कुरुते ? (प्रविश्य) प्रतिहारी—आर्य ! ग्रहं विजया । किं क्रियताम् ? काञ्चुकीयः—विजये ! निवेद्यता निवेद्यता भरतकुमाराय- "एष खलु रामदर्शनार्थम् जनस्थानं प्रस्थितः प्रतिनिवृत्तस्तत्रभवान् सुमन्त्र" इति । प्रतिहारी—आर्य ! अपि कृतार्थस्तातसुमन्त्र आगतः ? काञ्चुकीयः—भवति ! न जाने । हृदयस्थितशोकाग्निशोषिताननमागतम् दृष्ट्वैवाकुलमासीन्मे सुमन्त्रमधुना मनः ॥ (५) प्रतिहारी—आर्य ! एतच्छ्रुत्वा पर्याकुलमिव मे हृदयम् । काञ्चुकीयः—भवति ! किमिदानीं स्थिता ? शीघ्रं निवेद्यताम् । प्रतिहारी—आर्य ! इयं निवेदयामि । (निष्क्रान्त)