BharatKosha
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages

Page 158 of 178

Read in context
Page 158

( 171 ) =तुमने कहा। गतिः=अवस्था। अर्थे=लिए। महता रक्षसा=बलवान् राक्षस रावण के साथ। मायां=कपट को। उपाश्रित्य=ग्रहणं करके। ततः=इसके बाद। हृता=चुराई गई। अन्वय—मया नरपतिनिधनम् अनुभूतम्। मया एव नृपतिसुतव्यसनं दृष्टम्। च इह सः मैथिलीप्रणाशः श्रुतः। मे आयुषा गुण इव बहु अपराद्धम्। (८) अन्वय—विनीतानां क्रोधः कुतः। वा कृतचेतसां लज्जा। मया तैः विहीनम् तत् शून्यं तु तपोवनं दृष्टम्। (६) अन्वय—ज्येष्ठेन भ्रात्रा वालिना राज्यात् भ्रंशित. हतदारः शैले वसन् सुग्रीवः तुल्यदुःखेन मोक्षितः। (१०) अन्वय—मुनिजनस्य अर्थे महता रक्षसा वैरं कृतम्, ततः रावणेन मायां उपाश्रित्य सीता हृता। (११) हिन्दी अर्थ (इसके बाद सुमन्त्र और प्रतिहारी का प्रवेश) सुमन्त्र—(दुःखपूर्वक) अरे, बड़ा दुःख है। मैने राजा दशरथ की मृत्यु का अनुभव किया। मैंने ही राम का वनवास भी देखा। अब यही पर सीता का अपहरण भी सुन लिया है। मेरी लम्बी आयु ने गुण के बदले अपराध ही अधिक किए। (८) प्रतिहारी— (सुमन्त्र को लक्ष्य करके) आर्य, आइए, आइए। ये स्वामी है। इनके समीप जाइए। सुमन्त्र—(पास जाकर) राजकुमार की जय हो। भरत—तात, क्या आपने राम को देखा जिन्होंने संसार में पितृभक्ति प्रकट की है। क्या आपने सीता को देखा, जिस मे पतिव्रता अरुन्धती का दूसरा चरित्र प्राप्त होता है। क्या आपने लक्ष्मण को देखा, जिसने अपने भाई के स्नेह से बिना किसी कारण के वनवास को ग्रहण किया है। (सुमन्त्र चिन्ताग्रस्त से खड़े रहते है) प्रतिहारी—राजकुमार आप से ही पूछ रहे हैं। सुमन्त्र—हे देवी, क्या मुझ से?

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक) · Page 158 of 178 · BharatKosha