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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages
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( 171 ) =तुमने कहा। गतिः=अवस्था। अर्थे=लिए। महता रक्षसा=बलवान् राक्षस रावण के साथ। मायां=कपट को। उपाश्रित्य=ग्रहणं करके। ततः=इसके बाद। हृता=चुराई गई। अन्वय—मया नरपतिनिधनम् अनुभूतम्। मया एव नृपतिसुतव्यसनं दृष्टम्। च इह सः मैथिलीप्रणाशः श्रुतः। मे आयुषा गुण इव बहु अपराद्धम्। (८) अन्वय—विनीतानां क्रोधः कुतः। वा कृतचेतसां लज्जा। मया तैः विहीनम् तत् शून्यं तु तपोवनं दृष्टम्। (६) अन्वय—ज्येष्ठेन भ्रात्रा वालिना राज्यात् भ्रंशित. हतदारः शैले वसन् सुग्रीवः तुल्यदुःखेन मोक्षितः। (१०) अन्वय—मुनिजनस्य अर्थे महता रक्षसा वैरं कृतम्, ततः रावणेन मायां उपाश्रित्य सीता हृता। (११) हिन्दी अर्थ (इसके बाद सुमन्त्र और प्रतिहारी का प्रवेश) सुमन्त्र—(दुःखपूर्वक) अरे, बड़ा दुःख है। मैने राजा दशरथ की मृत्यु का अनुभव किया। मैंने ही राम का वनवास भी देखा। अब यही पर सीता का अपहरण भी सुन लिया है। मेरी लम्बी आयु ने गुण के बदले अपराध ही अधिक किए। (८) प्रतिहारी— (सुमन्त्र को लक्ष्य करके) आर्य, आइए, आइए। ये स्वामी है। इनके समीप जाइए। सुमन्त्र—(पास जाकर) राजकुमार की जय हो। भरत—तात, क्या आपने राम को देखा जिन्होंने संसार में पितृभक्ति प्रकट की है। क्या आपने सीता को देखा, जिस मे पतिव्रता अरुन्धती का दूसरा चरित्र प्राप्त होता है। क्या आपने लक्ष्मण को देखा, जिसने अपने भाई के स्नेह से बिना किसी कारण के वनवास को ग्रहण किया है। (सुमन्त्र चिन्ताग्रस्त से खड़े रहते है) प्रतिहारी—राजकुमार आप से ही पूछ रहे हैं। सुमन्त्र—हे देवी, क्या मुझ से?

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भरत—(मन में) सचमुच में महान् दुःख है। पीड़ा के कारण इनका हृदय स्थिर नहीं है। (प्रकट में) क्या आप बीच में से ही लौट आए? सुमन्त्र—राजकुमार, आपके आदेश से मैं राम के दर्शन के लिए जनस्थान गया हुआ बीच से ही कैसे लौट आता? भरत—कहीं वे लोग क्रोध और संकोच के कारण अपने को छिपा कर तो नहीं रहते? सुमन्त्र—राजकुमार, विनयी जनों को क्रोध कहाँ और निर्मल अन्तःकरण में लज्जा का प्रवेश कहाँ? किन्तु जब मैंने तपोवन देखा, तब वह उन लोगों से रहित तथा सूनसान था। (६) भरत—तो फिर वे कहाँ चले गए, कुछ सुना। सुमन्त्र—किष्किन्धा नामक नगर वानरों का निवास स्थान है। वहाँ चले गए, ऐसा सुना है। भरत—हाय, वानरों का तो मनुष्यों से परिचय नहीं होता। वहाँ वे कष्ट से रहते होंगे। सुमन्त्र—कुमार, पशु-पक्षी भी उपकार मानते हैं। भरत—तात, किस प्रकार? सुमन्त्र—सुग्रीव नाम के एक वानर को उसके बड़े भाई बाली ने राज्यच्युत कर दिया था और उसकी स्त्री भी छीन ली थी। पर्वत पर रहने वाले उस सुग्रीव को 'उसके समान दुःख वाले' राम ने कष्टमुक्त कर दिया। (१०) भरत—तात, 'उसके समान दुःख वाले' का आशय क्या है? सुमन्त्र—(मन में) हाय, मैंने तो सब कुछ कह दिया। (सबके सामने) कुमार, कुछ नहीं। मेरा आशय राज्य नहीं प्राप्त होने की समानता से है। भरत—तात, क्यों छिपा रहे हैं? यदि सच बात नहीं बताई तो आपको स्वर्गवासी महाराज दशरथ के चरणों की शपथ है। सुमन्त्र—क्या उपाय है? सुनो, मुनियों की रक्षा के कारण बलवान् राक्षसों से शत्रुता हो गई थी।

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( 173 ) इसी कारण रावण ने कपट वेश धारण करके सीता का हरण कर लिया। (११) (४) मूल भरतः—कथं हृतेति? (मोहमुपगतः) सुमन्त्रः—समाश्वसिहि, समाश्वसिहि। भरतः—(पुनः समाश्वस्य) भोः! कष्टम्। पित्रा च वान्धवजनेन च विप्रयुक्तो दुःखं महत् समनुभूय वनप्रदेशे। भार्यावियोगमुपलस्य पुनर्ममार्यो जीमूतचन्द्र इव खे प्रभया वियुक्तः॥ (१२) भोः! किमिदानीं करिष्ये? भवतु, दृष्टम्। अनुगच्छतु मां तातः। सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति कुमारः। (उभौ परिक्रामतः) सुमन्त्रः—कुमार! न खलु न खलु गन्तव्यम्। देवीनां चतुश्शालमिदम्। भरतः—अत्रैव मे कार्यम्। भोः! क इह प्रतिहारे? (प्रविश्य) प्रतिहारी—जयतु भर्तृदारकः। विजया खल्वहम्। भरतः—विजये! ममागमनं निवेदयात्रभवत्यै। प्रतिहारी—कतमस्यै भट्टिन्यै निवेदयामि। भरतः—या मां राजानमिच्छति। प्रतिहारी—(आत्मगतम्) हं किन्नु खलु भवेत्? (प्रकाशम्) भर्तः! तथा। (ततः प्रविशति कैकेयी प्रतिहारी च) कैकेयी—विजये! मां प्रेक्षितुं भरत आगतः। प्रतिहारी—भट्टिनि! तथा। भर्तृदारकस्य रामस्य सकाशात् तात- सुमन्त्र आगतः। तेन सह भर्तृदारको भरतो भट्टिनीं प्रेक्षितुमिच्छति किल। कैकेयी—(स्वगतम्) केन खलूद्घातेन मामुपालप्स्यते भरतः? प्रतिहारी—भट्टिनि! किं प्रविशतु भर्तृदारकः?

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( 176 ) प्रतिहारी—(मन में) अरे, अब क्या होगा ? (प्रकट में) स्वामी, अच्छा । (इसके बाद कैकेयी और प्रतिहारी का आगमन) कैकेयी—विजये, क्या भरत मुझसे मिलने आया है ? प्रतिहारी—महारानी, हा राजकुमार राम के पास से तात सुमन्त्र आए हैं . उनके साथ राजकुमार भरत ने महारानी ने मिलने की इच्छा प्रकट की है । कैकेयी—(मन में) न जाने किस बात पर भरत ताडना देगा । प्रतिहारी—महारानी, क्या राजकुमार आ जाएं ? कैकेयी—जाओ । उन्हें भेज दो । प्रतिहारी—महारानी, ठीक है । (घूम कर ओर पास जाकर) राजकुमार की जय हो । आप प्रवेश कीजिए । भरत—विजये, क्या सूचना दे दी ? प्रतिहारी—हाँ । भरत—तो फिर हम दोनों प्रवेश करे । (प्रवेश करते हैं) कैकेयी—पुत्र, विजया ने कहा है कि राम के पास से सुमन्त्र आए हैं ? भरत—आपको मैं इससे भी अच्छी सूचना दे रहा हूँ । कैकेयी—पुत्र, तब तो क्या कौसल्या और सुमित्रा को भी बुला लें ? भरत—नही, उन्हें नहीं सुनाना चाहिए । कैकेयी—(मन मे) अरे, पता नहीं क्या बात है । (प्रकट में) पुत्र, कहो तो । भरत—सुनो, जो अपने राज्य का परित्याग करके तुम्हारी आज्ञा से वन में गए थे, उनकी पत्नी सीता का अपहरण हो गया है । अब तो तुम्हारी इच्छा पूरी हुई । (१३) कैकेयी—अहो ! भरत—हाय, दुःख है कि तुम्हारी जैसी बहू को पाकर अत्यन्त पराक्रमी और सम्मान वाले इक्ष्वाकु वंश के लोगों को अपनी स्त्री के अपहरण को भी देखना पडा । (१४)

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( १७७ )

मूल कैकेयी—(आत्मगतम्) भवतु , इदानीं कालः कथयितुम् । (प्रकाशम्) जात ! त्वं न जानासि महाराजस्य शापम् । भरतः—किं शप्तो महाराजः ? कैकेयी—सुमन्त्र ! आचक्ष्व विस्तरेण । सुमन्त्र—यदाज्ञापयति भवती । कुमार ! श्रूयताम्—पुरामृगयां गतेन महाराजेन कस्मिंश्चित् सरसि कलश पूरयमाणो वनगजवृं हि- तानकारिशब्दसमुत्पन्नवनगजशङ्कया शब्दवेधिना शरेण विपन्नचक्षुषो महर्षेश्चक्षुर्भूतो गुणितनयो हिंसितः । भरतः—हिंसित इति । शान्तं शान्तं पापम् । ततस्ततः ? सुमन्त्रः—ततस्तमेव गतं दृष्ट्वा, तेनोक्तं रुदितस्यान्ते मुनिना सत्यभाषिणा । यथाहं भोस्त्वमप्येवं पुत्रशोकाद् विपत्स्यते ॥ (१५) इति । भरतः—नन्विदं कष्टं नाम । कैकेयी—जात ! एतन्निमित्तमपराध मा निक्षिप्य पुत्रको रामो वनं प्रेषितः, न खलु राज्यलोभेन । अपरिहरणीयो महर्षिशापः पुत्रविप्रवासं विना न भवति । भरतः—अथ तुल्ये विप्रवासे कथमहमरण्यं न प्रेषितः ? कैकेयी—जात ! मातुल कुले वर्तमानस्य प्रकृतिभूतस्ते विप्रवासः । भरत—अथ चतुर्दश वर्षाणि किं कारणमवेक्षितानि ? कैकेयी—जात ! चतुर्दश दिवसा इति वक्तुकामया पर्याकुलहृदयया चतुर्दश वर्षाणीत्युक्तम् । भरतः—अस्ति पाण्डित्यं सम्यग् विचारयितुम् । अपि विदितमेतद् गुरुजनस्य ? सुमन्त्रः—कुमार वसिष्ठवामदेवप्रभृतीनामनुमतं विदितं च । भरतः—हन्त ! त्रैलोक्यसाक्षिणः खल्वेते । दिष्ट्यानपराद्धात्रभवती । अम्ब ! यद् भ्रातृस्नेहात् समुत्पन्नमन्युना मया दूषितात्रभवती, तत्सर्वं मर्षयितव्यम् । अम्ब ! अभिवादये ।

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(184) तापस-- नन्दिलक, कुलपति ने कहा है कि अपनी स्त्री का अपहरण करने वाले, तीनो लोको को व्याकुल करने वाले रावण को मारकर, राक्षसी आचरण के विरुद्ध, अनेक गुणो से मण्डित विभीषण का अभिषेक करके, देवताओं और ऋषियो के सम्मुख अपने पवित्रचरित्र को प्रमाणित करने वाली देवी सीता को लेकर, भालू, वानरो और राक्षसों के प्रमुख व्यक्तियो से घिरे हुए श्री राम यहाँ आए हुए है, जो शरद् ऋतु के स्वच्छ आकाश के चन्द्रमा के समान सुशोभित हो रहे है। आज इस तपोवन मे अरण्य सुलभ भोग-वैभव के अनुसार उनका स्वागत करने के लिए जो अभीष्ट है, वह सब सज्जित करके रखा जाए। नन्दिलक--आर्य, सब कुछ तैयार है। किन्तु, तापस--यह क्या ? नन्दिलक--यहाँ विभीषण के साथ अन्य राक्षस भी है। उनके खाने के सम्बन्ध में कुलपति ही जानें। तापस--किसलिए ? नन्दिलक--वे तो मांस भी खाते है। तापस--अरे, मत घबराओ। वे राक्षस तो विभीषण के वश में रहने वाले है। नन्दिलक--तो ऐसे सज्जन राक्षस को नमस्कार। (निकल जाता है) तापस--(देख कर) अरे, ये तो श्रीमान् राम है। जो- "हे मनुष्यो मे श्रेष्ठ, आपकी जय हो। आप अपने दूसरे शत्रुओ पर भी विजय प्राप्त करें। यह पृथ्वी एकच्छत्र वाली होकर आपके अधीन हो" इस प्रकार प्रसन्न बने बहुत से मुनियो द्वारा प्रशंसित होकर राजा राम पुष्पक- विमान से पृथ्वी तल पर उतर गए है। (१)

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( 185 ) (२) मूल (ततः प्रविशति रामः) रामः--भोः ! समुदितबलवीर्यम् रावणं नाशयित्वा जगत्ति गुणसमग्रां प्राप्य सीतां विशुद्धाम् । वचनमपि गुरूणामन्तः पूरयित्वा मुनिजनवनवासं प्राप्तवानस्मि भूयः ॥ (२) तापसीनांमभिभवनार्थमभ्यन्तरं प्रविष्टा चिरायते खलु मैथिली । (विलोक्य) अये ! इयं वैदेही, सरवीति सीतेति च जानकीति यथावयः स्निग्धतरं स्नुषेति । तपस्विदारैर्जनकन्द्रपुत्री सम्भाष्यमाणा समुपैति मन्दम् ॥ (३) (ततः प्रविशति सीता तापसी च) तापसी—हला ! एष ते कुटुम्बिकः । उपसर्पैनम् । न शक्यं त्वामे- काकिनीम् प्रे क्षितुम् । सीता—हम्, अद्यात्यविश्वसनीयमिव मे प्रतिभाति । (उपसृत्य) जय- त्वार्यपुत्रः । रामः—मैथिलि ! अपि जानासि, पूर्वाधिष्ठानमस्माकं जनस्थानमा- सीत् । अप्यत्र ज्ञायन्ते पुत्रकृतका वृक्षाः । सीता—जानामि जानामि । अवलोकितंपत्रका उल्लोकयितव्या इदानी संवृत्ताः । रामः—एवमेतत् । निम्नस्थलोत्पादको हि कालः । मैथिलि ! अप्यु- पलभ्यतेऽस्य सप्तपर्णस्याधस्ताच्छुक्लवाससं भरतं दृष्ट्वा परि- त्रस्तं मृगयूथमासीत् । सीता—आर्यपुत्र ! दृढं खलु स्मरामि । रामः—अयं तु नस्तपसः साक्षिभूतो महाकच्छः ।

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( 186 ) अत्रास्माभिरासीनैस्तातस्य निवपनक्रिया। चिन्तयद्भिः काञ्चनपार्श्वो नाम मृगो दृष्टः । सीता—हम् आर्यपुत्र ! मा खलु मा खल्वेवं भणितुम् । (भीता वेपते) रामः—अलमलं सम्भ्रमेण । अतिक्रान्तः खल्वेषकालः । (दिशो विलोक्य) अये कुतो नु, रेणुः समुत्पतति लोध्रसमानगौरः सम्प्रावृणोति च दिशः पवनावधूतः । शङ्खध्वनिश्च पटहस्वनधीरनादः सम्मूर्च्छितो वनमिदं नगरीकरोति ॥ (४) शब्दार्थ—समुदितबलवीर्यम् = अच्छी तरह से बढ़ी हुई शक्ति वाले । जगति=संसार मे । गुणसमग्राम् = सभी गुणों से युक्त । विशुद्धाम्=पवित्र । गुरुणाम्=पिता आदि के । अन्तशः=अक्षरशः या पूरी तरह से । पूरयित्वा= पूरा करके । प्राप्तवान् अस्मि = आ गया हूँ । भूयः = फिर । अभिवादनार्थम्= प्रणाम के लिए । अभ्यन्तरं अन्दर । प्रविष्टा=गई हुई । चिरायते=देर कर रही है । यथावयः = अपनी अवस्था के अनुरूप । स्निग्धतर = अत्यन्त प्रेम से । स्नुषा=पुत्रवधू । तपस्विदारैः = मुनियों की स्त्रियों द्वारा । जनकेन्द्र- पुत्री = सीता । सम्भाष्यमाणा=बातचीत करती हुई । समुपैति = पास आ रही है । मन्दम् = धीरे-धीरे । कुटुम्बिकः = पति । उपसर्प = पास जाओ । एनम् = इसके । प्रेक्षितुम्=देखने में । अविश्वसनीयम् = बिना भरोसे के । मे= मुझे । प्रतिभाति = लगता है । उपसृत्य=पास जाकर । अपि=क्या । जानासि= याद करती हो । पूर्वाधिष्ठानं = पहले के समय का निवास । ज्ञायन्ते=पहचान रही हो । पुत्रकृतकाः=कृत्रिम पुत्र । अवलोकितपत्रकाः=थोड़े से पत्तों वाले अर्थात् छोटे । उल्लोक यितव्याः=शिर ऊँचा उठा कर देखने योग्य अर्थात् बड़े । संवृत्ताः=हो गए। निम्नस्थलोत्पाटक=नीचे-ऊँचे भाव को पैदा करने वाला । कालः=समय । उपलभ्यते=याद कर रही हो । सप्तपर्णस्य=सतछोने के वृक्ष के । अधस्तात्=नीचे । शुक्लवासम्=श्वेत वस्त्र पहने । परित्रस्त= भयभीत । मृगयूथम्=हरिणों का समूह । दृढम्=अच्छी तरह । नः=हमारी । तपसः=तपस्या का । साक्षिभूत = गवाह बना । महाकच्छः=बड़ा तालाब ।

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आसीनैः = बैठे हुए । निवपनक्रियां = पिण्डदान को । चिन्तयद्भिः = सोचते हुए । भीता = डरी हुई । वेपते = कापती है । अलम् = व्यर्थ । सम्भ्रमेण = सन्देह करना । अतिक्रान्तः = बीत गया । दिशः = चारों ओर । रेणुः = धूलि । समुत्पतति = उड़ रही है । लोध्रसमानगौरः = लोध के समान श्वेत वर्ण की । सम्प्रा- वृणोति = अच्छी तरह ढक रही है । पवनावधूतः = हवा से उड़ाई गई । पटह- स्वनधीरनादैः = नगाड़े की ध्वनि की गम्भीर गर्जना से । सम्मूर्च्छितः = अच्छी तरह बढ़ा हुआ । नगरीकरोति = नगर बना रहा है । अन्वय — समुदितबलवीर्यम् रावणं नाशयित्वा, जगति गुणसमग्रो विशुद्धां सीतां प्राप्य, गुरूणां वचनम् अपि अन्तशः पूरयित्वा, भूयः मुनिजन- वनवासं प्राप्तवान् अस्मि । (२) अन्वय — सखी इति, सीता इति, जानकी इति च, यथावयः स्निग्धं- तरं स्नुषा इति जनकेन्द्रपुत्री तपस्विदारै सम्भाष्यमाणा मन्दम् समुपैति । (३) अन्वय — लोध्रसमानगौरः रेणुः समुत्पतति, च पवनावधूतः दिशः सम्प्रावृणोति । पटहस्वनधीरनादैः सम्मूर्च्छितः शङ्खध्वनिः इदं वनं नगरी- करोति । (४) हिन्दी अर्थ (इसके बाद राम प्रवेश करते हैं) राम—अहा, अत्यन्त पराक्रम सम्पन्न रावण को मार कर, संसार में सभी गुणों से पवित्र सीता को प्राप्त कर, पिताजी की आज्ञा का भी पूरी तरह से पालनकर पुनः मुनियों के इस निवास स्थान में आ गया हूँ । (२) मुनियों की स्त्रियों की वन्दना करने के लिए अन्दर गई हुई सीता काफी विलम्ब कर रही है । (देखकर) अरे, यह सीता किसी के द्वारा सखी, किसी से सीता, किसी से जानकी इस प्रकार उम्र के अनुसार सम्बोधित की जा रही है । कोई इसेअत्यन्त स्नेह से, 'बहू' कह रही है। इस प्रकार यह सीता अन्य तपस्वियों की पत्नियों के साथ वार्तालाप करती हुई धीरे-धीरे इधर ही आ रही है । (३) (इसके बाद सीता और तापसी का प्रवेश) तापसी—अरी, ये तुम्हारे भर्ता हैं । इनके पास जाओ। मैं तुमको अकेली नहीं देख सकती हूं।

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( 188 ) सीता—हूं । आज भी मुझे विश्वास नही होता । (पास जाकर) आर्यपुत्र की जय हो । रामः—सीते, क्या जानती हो, पहले हम इस जनस्थान मे रहा करते थे । क्या तुम पुत्र के समान पाले गए इन वृक्षों को पहचानती हो ? सीता—जानती हूँ, जानती हूं । जिन वृक्षों को छोटे-छोटे पत्तो वाली स्थिति मे देखा था, अब वे नेत्र ऊपर करके देखने योग्य हो गए हैं । राम—ऐसा ही है । समय सचमुच अन्तर उत्पन्न कर देता है । सीते, याद है, इस सप्तपर्ण वृक्ष के नीचे श्वेत वस्त्र पहने हुए भरत को देख कर हरिणों का झुण्ड भयभीत हो गया था । सीता—आर्यपुत्र, अच्छी तरह से याद है । राम—और यह हमारी तपस्या का साक्षी बना हुआ विशाल सरोवर है । यही बैठ कर हमने पिताजी की श्राद्ध क्रिया की चिन्ता करने के समय कांचनपार्श्व नामक हिरण को देखा था । सीता—हूँ, आर्यपुत्र, उसका आप नाम मत लीजिए, मत लीजिए । (भयभीत होकर कांपती है ।) राम—मत घबराओ, मत घबराओ वह समय तो बीत गया । (चारों ओर देख कर) अरे, यह क्या है ? लोध्रपुष्प के समान सफेद धूल उड रही है । वह हवा से प्रसारित की हुई चारो दिशाओं को ढक रही है । यह शंख ध्वनि वाद्य यन्त्रो तथा शूर वीरों के गर्जन से वृद्धि को प्राप्त करके इस शान्त तपोवन को नगर का रूप दे रही है । (४) (३) मूल (प्रविश्य) लक्ष्मणः—जयत्वार्यः ! आर्य ! अयं सैन्येन महद्वता त्वग्दर्शनसमुत्सुकः । मातृभिः सह सम्प्राप्तो भरतो भ्रातृवत्सलः ॥ (५) रामः—वत्स लक्ष्मण ! किमेवं भरतः प्राप्त इति ? लक्ष्मणः—आर्य ! अथ किम् । रामः—मैथिली ! श्वश्रूजनपुरोगं भरतमवलोकयितुं विशालीक्रियतां ते चक्षुः ।

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सीता--आर्यपुत्र ! एष्टव्ये काले भरतः आगतः । (ततः प्रविशति भरतः समातृकः) भरतः--तैस्तैः प्रवृद्धविषयैर्विषमैर्विमुक्त मेघैर्विमुक्तममलं शरदिव सोमम् । आर्यासहायमहमद्य गुरुं दिदृक्षुः प्राप्तोऽस्मि तुष्टहृदयः स्वजनानुबद्धः ॥ (६) रामः--अम्बा ! अभिवादये । सर्वाः--जात ! चिरञ्जीव । दिष्ट्या वर्धामहे अवसितप्रतिज्ञं त्वां कुशलिनं सह वध्वा प्रेक्ष्य । रामः--अनुगृहीतोऽस्मि । क्ष्मणलः--अम्बाः । अभिवादये। सर्वाः--जात ! चिरजीव । लक्ष्मणः--अनुगृहीतोऽस्मि । सीता--आर्याः ! वन्दे । सर्वाः--वत्से ! चिरमङ्गला भव । सीता--अनुगृहीतास्मि । भरतः--आर्य ! अभिवादये, भरतोऽहमस्मि । रामः - एह्येहि वत्स ! इक्ष्वाकुकुमार ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव । वक्षः प्रसारयं कवाटपुटप्रमाण मालिङ्ग मां सुविपुलेन भुजद्वयेन । उन्नामयाननमिदं शरदिन्दुकल्प प्रह्लादय व्यसनदग्धमिदं शरीरम् ॥ (७) भरतः--अनुगृहीतोऽस्मि । आर्ये ! अभिवादये । भरतोऽहमस्मि । सीता--आर्यपुत्रेण चिरसञ्चारी भव । भरतः--अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! अभिवादये । लक्ष्मणः--एह्येहि वत्स ! दीर्घायुर्भव । परिष्वजस्व गाढम् । (आलि- ङ्गति)

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( 190 ) भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! प्रतिगृह्यता राज्यभारः । रामः - वत्स ! कथमिव । कैकयी—जात ! चिराभिलषितः खल्वेष मनोरथः । शब्दार्थ—भ्रातृवत्सलः = भाई से स्नेह रखने वाला । श्वश्रूजनपु- रोगं = सासुएँ जिसके आगे चल रही हैं, ऐसे भरत को । अवलोकयितुम्=देखने को । विशालीक्रियता=दीर्घ बनाओ । एष्टव्ये = अभीष्ट, चाहे गए । समा- तृकः = माताओं के साथ । प्रवृद्धंविपर्यं = अनेक प्रकार के । विपमैः = संकटों से । विमुक्तं = विरहित या छूटा हुआ । अमलं = स्वच्छ । शरदि = शरद् ऋतु में । सोमम् = चन्द्रमा को । आर्यासहाय = सीता के सहित । गुरुं = पूज्य को । दिदृक्षुः = देखने का इच्छुक । तुष्टहृदयः = प्रसन्न मन वाला । स्वज- नानुबद्धः = अपने आदमियों द्वारा पीछे-पीछे आते हुए । अम्बाः = हे जननियो । वर्धामहे=आनन्द से परिपूर्ण हैं । अवसितप्रतिज्ञं = पूर्ण व्रत वाले । सह वध्वा= बहू सीता के साथ । चिरमङ्गला = बहुत समय तक कल्याण प्राप्त करने वाली । अनुगृहीत = कृपा से युक्त । आर्यपुत्रेण = राम के साथ । चिर- सञ्चारी = बहुत समय तक साथ चलने वाले अर्थात् सुख भोगने वाले । प्रति- गृह्यता = स्वीकार करो । चिराभिलषितः = बहुत समय से इच्छित । अन्वय —अयं भ्रातृवत्सलः त्वद्दर्शनसमुत्सुकः भरतः महता सैन्येन मातृभिः सह सम्प्राप्तः । (५) अन्वय—अद्य तुष्टहृदयः अहम् स्वजनानुबद्धः शरदि मेघैः विमुक्तम् अमलं सोमम् इव तैः तैः प्रवृद्धविपर्यैः विषमः विमुक्तम् आर्यासहाय गुरुं दिदृक्षुः प्राप्तः अस्मि । (६) अन्वय—यह पद्य अंक ४, पद्य १६ में पहले आ चुका है । (७) हिन्दी अर्थ (प्रवेशक रुके) लक्ष्मण—आर्य की जय हो ! हे आर्य, भाई से स्नेह रखने वाला, आपके दर्शन के लिए लालायित बना यह भरत विशाल सेना को लेकर माताओं के साथ यहां आ गया है । राम—वत्स लक्ष्मण, क्या ऐसा ? भरत आ गया है । लक्ष्मण—आर्य, और क्या ।

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( 191 ) राम -- सीते, भरत के साथ तुम्हारी सासुएँ आ रही हैं। उनके दर्शन के लिए तुम्हारी आँखो को विशाल बना लो। सीता -- आर्यपुत्र, चाहे गए समय पर भरत आ गए। (इसके बाद भरत का माताओं के सहित प्रवेश) भरत -- आज अतिप्रसन्न हृदय वाला मै अपने आत्मीय जनो के साथ, शरद् काल मे बादलो से रहित् स्वच्छ चन्द्रमा के समान, नाना प्रकार के संकटो से मुक्त हुए, पूज्य सीता के सहित राम को देखने को इच्छुक यहा आया हूँ। (६) राम -- जननियो, मै प्रणाम करता हूं। सभी -- पुत्र चिरजीव रहो। सौभाग्य से, अपने वचन निभाकर, सीता के साथ तुम्हे कुशलतापूर्वक देख कर हम बहुत सुखी हैं। राम -- कृपा से युक्त हूँ। लक्ष्मण -- जननियो को प्रणाम। सभी -- पुत्र, चिरजीवी बनो। लक्ष्मण -- कृपायुक्त हूँ। सीता -- पूज्य जनो को प्रणाम। सभी -- वत्से, सदा सुहागिन रहो। सीता -- कृतकृत्य हो गई। भरत -- आर्य, मैं भरत आपको अभिवादन करता हूँ। राम -- आओ, वत्स, इक्ष्वाकुकुमार, तुम्हारा कल्याण हो। दीर्घायु बनो। किवाडो के समान अपने विशालवक्ष स्थल को फैलाओ और अपनी दोनों लम्बी भुजाओ से मेरा आलिंगन करो। अपने शरद् कालीन चन्द्रमा के समान इस सुन्दर मुख को ऊपर उठाओ तथा मेरे इस दुःख से सन्तप्त शरीर को आनन्द प्रदान करो। (७) भरत -- अनुगृहीत हूँ। हे देवी, मैं भरत प्रणाम करता हूँ। सीता -- आर्यपुत्र के साथ बहुत समय तक रहो। भरत -- अनुगृहीत हूँ। आर्य, मैं प्रणाम करता हूँ। लक्ष्मण -- वत्स, आओ, आओ, दीर्घायु बनो। मेरा प्रगाढ आलिंगन करो (आलिंगन करता है)

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192 ) भरत—कृतकृत्य हूँ । आर्य, राज्य के भार को स्वीकार करो । राम—वत्स, क्यो ? कैकेयी—पुत्र, हमारी यह इच्छा तो बहुत दिनो से है । (४) मूल (ततः प्रविशति शत्रुघ्नः) शत्रुघ्नः—विविधैर्व्यसनैः क्लिष्टमक्लिष्टगुणतेजसम् । द्रष्टुं मे त्वरते बुद्धी रावणान्तकरं गुरुम् ॥ (८) (उपगम्य) आर्य ! शत्रुघ्नोऽहमभिवादये । राम.—एह्येहि वत्स ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव । शत्रुघ्नः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्ये ! अभिवादये । सीता--वत्स ! चिरजीव । शत्रुघ्नः--अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! अभिवादये । लक्ष्मणः--स्वस्ति, आयुष्मान् भव । शत्रुघ्नः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! एतौ वसिष्ठवामदेवौ सह प्रकृति- भिरभिषेकं पुरस्कृत्य त्वद्दर्शनमभिलषतः । तीर्थोदकेन मुनिभिः स्वयमाहृतेन नानानदीनदगतेन तव प्रसादात् । इच्छन्ति ते मुनिगणाः प्रथमाभिषिक्तं द्रष्टुं मुखं सलिलसिक्तमिवारविन्दम् ॥ (६) कैकेयी—गच्छ जात ! अभिलषाभिषेकम् । रामः—यदाज्ञापयत्यम्बा । (निष्क्रान्तः) (नेपथ्ये) जयतु भवान् । जयतु स्वामी । जयतु महाराजः । जयतु देवः । जयतु भद्रमुखः । जयत्वार्यः । जयतु रावणान्तकः । कैकेयी—एते पुरोहिताः काञ्चुकिनः पुत्रकस्य मे विजयघोषं वर्धयन्त आशिभिः पूजयन्ति । सुमित्रा—प्रकृतयः परिचायिकाः सज्जनाश्च पुत्रकस्य मे विजय वर्धयन्ति ।

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(नेपथ्ये) भो भो जनस्थानवासिनस्तपस्विनः ! शृण्वन्तु शृण्वन्तु भवन्तः । हत्वा रिपुप्रभवमप्रतिमं तमौघं सूर्योऽन्धकारमिव शौर्यमयैर्मयूखैः । सीतामवाप्य सकलाशुभवर्जनीया रामो मही जयति सर्वजनाभिरामः ॥ (१०) कैकेयी—अम्महे ! पुत्रस्य मे विजयघोषणा वर्धते । शब्दार्थ—व्यसनैः=सकटो से । क्लिष्टुं=पोडित । अक्लिष्टगुणतेजसम्= बढ़े गुणों के प्रभाव वाले । द्रष्टुं=देखने के लिए । त्वरते=शीघ्रता कर रही है । बुद्धिः=मन । रावणान्तकरं=रावण को मारने वाले । गुरुम्=श्रीराम को । एतौ=ये दोनों । सह प्रकृतिभिः=प्रजागण के साथ । पुरस्कृत्य=आगे करके । अभिलषतः=चाहते हैं । आहृतेन=लाए गए । नानानदीनदगतेन=बहुत सी नदियों और तालाबों में प्राप्त होने वाले । प्रसादात्=कृपा से । सलिलसिक्तम्=जल से भीगे । इव=तुल्य । अरविन्दम्=कमल । अभिलष=प्राप्त करो । भद्रमुख= कल्याणकारी मुख वाले । रावणान्तिक=रावण को मारने वाले । आशिभिः= शुभ वचनों से । पूजयन्ति=अभिनन्दन करते हैं-। प्रकृतयः=प्रजा । परिचारकाः= सेवक । वर्धयन्ति=बढ़ा रहे हैं । रिपुप्रभवं=शत्रुजन्य । अप्रतिम=अनुपम । तमौघं=दुःखों के समूह को । शौर्यमयैः=पराक्रम रूपी । मयूखैः=किरणों से । अवाप्य=णप्त करके । सकलाशुभवर्जनीयां=सम्पूर्ण अमंगलों से रहित । मही= पृथ्वी को । जयति=वश मे करते है । सर्वजनाभिरामः=सकल लोक प्रिय । अम्महे=अहो । अन्वय—विविधैः व्यसनैः क्लिष्टम्, अक्लिष्टगुणतेजसम् रावणान्त- करम् गुरुम् द्रष्टुम् मे बुद्धिः त्वरते । (८) अन्वय—तव प्रसादात् मुनिभिः स्वयम् आहृतेन नानानदीनदगतेन तीर्थोदकेन प्रथमाभिषिक्तम् ते मुखम् मुनिगणाः सलिलसिक्तम् अरविन्दम् इव द्रष्टुम् इच्छन्ति । (६) अन्वय—अप्रतिमम् रिपुप्रभवम् तमौघम् सूर्य अन्धकारम् इव शौर्य- मयैः मयूखैः हत्वा सकलाशुभवर्जनीयाम् सीताम् अवाप्य सर्वजनाभिरामः रामः महीम् जयति ।

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( 194 ) हिन्दी अर्थ (इसके बाद-शत्रुघ्न का प्रवेश) शत्रुघ्न—अनेक प्रकार के दु खो से घिर कर भी जिनका दिव्य तेज और गुण प्रदीप्त होता रहा और जिन्होंने अपने प्रबल शत्रु रावण का सरलता से विनाश किया, पूज्य राम को देखने के लिए मेरा मन शीघ्रता कर रहा है । (8) (पास जाकर) आर्य, मैं शत्रुघ्न प्रणाम करता हूँ । राम—वत्स, आओ, आओ । कल्याण हो, दीर्घायु बनो । शत्रुघ्न—अनुगृहीत हूँ । आर्ये प्रणाम । सीता—वत्स, बहुत समय तक जीवित रहो । शधुघ्न—अनुगृहीत हूँ । आर्य, प्रणाम करता हूँ । लक्ष्मण—कल्याण हो, दीर्घायु बनो । शत्रुघ्न—अनुगृहीत हूँ । आर्य, ये, दोनो वसिष्ठ और वासुदेव प्रजागण के साथ अभिषेक को आगे लेकर आपसे-मिलना चाहते हैं। मुनिजन स्वयं जाकर बहुत सी छोटी-बडी नदियो से तीर्थ जल लाए है । उनकी इच्छा है-कि आप सर्वप्रथम अभिषेक जल ग्रहण करे । इसके बाद अभिषेक जल से सिक्त कमल की तरह विकसित आपके मुख का वे दर्शन करना चाहते है । (६) कैकेयी—जाओ पुत्र । राज्याभिषेक को स्वीकार करो । राम—जैसी जननी की आज्ञा । (निकल जाते हैं) (नेपथ्य मे) आपकी जय । स्वामी की जय । महाराज की जय । देव की जय । भद्रमुख की जय । आर्य की जय । रावण के विनाशक की जय । कैकेयी—ये पुरोहित और कचुकी मेरे पुत्र का विजय नाद करते हुए आशीर्वचनों अभिनन्दन कर रहे है सुमित्रा—प्रजा के लोग, सेवक और सज्जन गण मेरे पुत्र की विजय घोषणा कर रहे है । (नेपथ्य मे) हे जनस्थान मे रहने वाले तपस्वियो, आप लोग सुनिए, सुनिए । जिस प्रकार सूर्य अपनी प्रखर किरणों से अन्धकार का विनाश करता

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है, उसी प्रकार अपने अनुपम पराक्रम से शत्रुओं द्वारा उत्पन्न सकटों के समूह को नष्ट कर, मंगलमयी सीता को पाकर नयनाभिराम राम ने पूरी पृथ्वी पर अधिकार लिया है। (१०) कैकेयी—अहा, मेरे पुत्र की विजय घोषणा बढ़ रही है। (५) मूल— (ततः प्रविशति कृताभिषेको रामः सपरिवारः) रामः—(विलोक्यैाकाशे) भोस्तात ! स्वर्गेऽपि तुष्टमुपगच्छ विमुञ्च दैन्यं कर्म त्वयाभिलषितं मयि यत् तदेतत् । राजा किलास्मि भुवि सत्कृतभारवाही धर्मेण लोकपरिरक्षणमभ्युपेतम् ॥ (११) भरतः—अधिगतनृपशब्दं धार्यमाणातपत्रं विकसितकृतमौलि तीर्थतोयाभिषिक्तम् ! गुरुमधिगतलीलं वन्द्यमानं जनौधै (र्नवशशिनमिवार्यम् पश्यतो मे न तृप्तिः ॥ (१२) शत्रुघ्नः—एतदार्याभिषेकेण कुलं मे नष्टकल्मषम् । (पुनः प्रकाशता याति सोमस्येवोदये जगत् ॥ (१३) रामः—वत्से लक्ष्मण ! अधिगतराज्योऽहमस्मि । लक्ष्मणः—दिष्ट्या भगवान् वर्धते । (प्रविश्य) काञ्चुकीयः—जयतु महाराजः । एष खलु तत्रभवान् विभीषणो विज्ञापयति—सुग्रीवनीलमैन्दजाम्बवद्धनमत्प्रमुखांश्चानु- गच्छन्तो विज्ञापयन्ति “दिष्ट्या भवान् वर्धते” इति । रामः—“सहायानां प्रसादाद् वर्धत” इति कथ्यताम् । काञ्चुकीयः—यदाज्ञापयति महाराजः । कैकेयी—धन्या खल्वस्मि । इममभ्युदयमयोध्यायां प्रे क्षितुमिच्छामि । रामः—द्रक्ष्यति भवती । (विलोक्य) अये ! प्रभाभिर्वनमिदमखिलं सूर्यवत् प्रतिभाति । (विभाव्य) आः ज्ञातम् । सम्प्राप्तं

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( 196 ) पुष्पकं दिवि रावणस्य विमानम्‌। कृतसमयमिद स्मृतमात्र- मुपगच्छतीति । तत्‌ सर्वैरारुह्यताम्‌ । (सर्वे आरोहन्ति) रामः—अद्यैव यास्यामि पुरीमयोध्या सम्बन्धिमित्रैरनुगम्यमानः । लक्ष्मणः - अद्यैव पश्यन्तु च नागरास्त्वा चन्द्रं सनक्षत्रमिवोदयस्थम्‌ ॥ (१४) (भरतवाक्यम्‌) यथा रामश्च जानक्या बन्धुभिश्च समागतः । तथा लक्ष्म्या समायुक्तो राजा भूमिं प्रशास्तु नः ॥ (१५) (निष्क्रान्ताः सर्वे) इति सप्तमोऽङ्कः । शब्दार्थ—कृताभिषेकः = राज्याभिषेक किए हुए । तुष्टिं सन्तोष को । उपगच्छ = प्राप्त करो । विमुञ्च = परित्याग करो । दैन्यम् = चिन्ता को । अभिलषितं=इच्छित । भुवि=पृथ्वी पर । सत्कृतभारवाही = सम्मानपूर्ण कार्य का वाहक । धर्मेण=धर्मपूर्वक । लोकपरिरक्षणं=प्रजा का संरक्षण । अभ्यु- पेतम्=स्वीकार कर लिया । अधिगतनृपशब्द = राजा शब्द को प्राप्त कर लिया । धार्यमाणातपत्र = राजच्छत्र को धारण कर लिया । विकसितकृत- मौलिम् = मस्तक को उन्नमित किया । तीर्थतोयाभिषिक्तं = तीर्थों के जल से स्नान करने वाले । गुरुम्=पूज्य राम को । अधिगतलीलम् = लक्ष्मी को प्राप्त करने वाले । वन्द्यमानम् = प्रणाम किए जाते हुए । जनौघैः = लोक समूह के द्वारा । नवशशिनम् इव=दूज के चाँद की भाँति । पश्यतः = देखते हुए । तृप्तिः=सन्तोष । नष्टकल्मषं = कलङ्कहीन । प्रकांशनाम् - दीप्तिशालिता को । याति = प्राप्त करता है । सोमस्य इव = चन्द्रमा के समान । उदये = उदय- के समय । जगत् = संसार । अधिगतराज्यः = राज्य प्राप्त करने वाला । वर्धन्ते = वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं । मैन्द = एक वानर का नाम । जाम्ब- वत्=एक भालू का नाम । हनूमत् = हनुमान । अनुगच्छन्तः=पीछे आते हुए ।

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( 197 )

सहायानां = सहायकों की । प्रसादात् = कृपा से । अभ्युदयं = राज्याभिषेक रूपी महोत्सव को । धन्या = पुण्यशालिनी । प्रेक्षितुं = देखने की । द्रक्ष्यति = देखोगी । भवती = देवी । प्रभाभिः = तेज के द्वारा । अखिल = समूचा । सूर्यवत् = सूर्य के समान । प्रतिभाति = प्रकाशित हो रहा है । विभाव्य = विचार कर के । सम्प्राप्तम् = आ पहुँचा है । पुष्पकं = विमान का नाम । कृतसमय = संकेत देने पर । स्मृतमात्रं = स्मरण काल मे । उपगच्छति = समीप जाता है । आरु- ह्यताम् = आरोहण किया जाए । यास्यामि = जाऊँगा । नागराः = नगर निवासी । त्वाम् = राम को । सनक्षत्रम् = अन्य तारा गणों के साथ । उदय- स्थम् = उदयाचल पर विद्यमान । जानक्या = सीता के साथ । समायुक्तः = परिपूर्ण होकर । प्रशास्तु = पालन करें । नः = हमारे । अन्वय-स्वर्गे अपि तुष्टिम् उपगच्छ । दैन्यं विमुञ्च । त्वया मयि यत् कर्म अभिलषितम् तत् एतत् (निवृत्तम्) । किल भुवि सत्कृतभारवाही राजा अस्मि । धर्मेण लोकपरिरक्षणम् अभ्युपेतम् । (११) अन्वय —अधिगतनृपशब्दम् , धार्यमाणातपत्रम्, विकसितकृतमौलिम्, तीर्थतोयाभिषिक्तम्, गुरुम् अधिगतलीलम् जनौघैः वन्द्यमानम् नवशशिनम् इव आर्यम् पश्यतः मे तृप्तिः न (जायते) । (१२) अन्वय—आर्याभिषेकेण नष्टकल्मषम् मे एतत् कुलम् सोमस्य उदये जगत् इव पुनः प्रकाशतां याति । (१३) अन्वय —अद्य एव अयोध्यां पुरीम् सम्बन्धिमित्रैः अनुगम्यमानः यास्यामि । च अद्य एव नागराः उदयस्थं सनक्षत्रं चन्द्रम् इव त्वाम् पश्यन्तु । (१४) अन्वय—यथा रामः जानक्या बन्धुभिः च समागतः, तथा लक्ष्म्या समायुक्तः नः राजा भूमिम् प्रशास्तु । (१५) हिन्दी अर्थ (इसके बाद अभिषेक किए हुए राम का परिवार के साथ प्रवेश) राम — (आकाश की ओर देखकर) हे पिताजी, आप अब स्वर्ग मे आनन्द प्राप्त करें तथा सन्ताप को भूल जाएं ।

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( 198 ) आपने मेरा राज्याभिषेक करना चाहा था, वह अब पूरा हुआ। अब मैं पृथ्वी पर पुण्य भार का वहन करने वाला राजा बन गया हूं। मैंने न्यायपूर्वक प्रजापालन का उत्तरदायित्व स्वीकार कर लिया है। (११) भरत— महाराज की पदवी प्राप्त करने वाले, राजच्छत्र ग्रहण करने वाले, प्रकाशमान मुकुट पहनने वाले, तीर्थों के जल से अभिषेक स्वीकार करने वाले, पूजनीय, राजलक्ष्मी को प्राप्त करने वाले, प्रजाओ के समूहों से जय-जयकार की ध्वनि वाले, नये चन्द्रमा की भाँति आर्य राम को देखते हुए मुझे तृप्ति नही हो रही है । (१२) शत्रुघ्न— जिस प्रकार चन्द्रमा के उदय से सारा ससार प्रकाशित होने लगता है, उसी प्रकार आर्य राम के राज्याभिषेक से निष्कलक मेरा यह रघुकुल फिर से प्रकाशमान हो रहा है। (१३) राम— वत्स लक्ष्मण, अब मैंने राज्य पा लिया है। लक्ष्मण— सौभाग्य की बात है कि आप वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं। (प्रवेश करके) काञ्चुकीय— महाराज की जय हो। ये श्रीमान् विभीषण सूचित करते हैं कि सुग्रीव, नील, मैन्द, जाम्बवान्, हनुमान् आदि आपके अनुचर निवे- दन कर रहे है— "अहोभाग्य, आपको बधाई।" राम— उनमे कह दो कि "आप सहायकों की कृपा से सब विजय है।" काञ्चुकीय-- जैसी महाराज की आज्ञा। कैकेयी— मैं सौभाग्यशालिनी हूं। इस वैभव को मैं अयोध्या मे भी देखना चाहती हूँ। राम— आप देखेंगी। (देखकर) अरे, यह समूचा तपोवन सूर्य के समान कान्ति से देदीप्यमान हो रहा है। (विचार कर के) अच्छा समझ गया। आकाश मे रावण का पुष्पक विमान आ गया है। यह ठीक समय पर याद करने मात्र से उपस्थित हो जाता है। तो आप सब इस पर चढिए। (सब चढते हैं)